इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश के श्रावस्ती में हुए एक कथित पुलिस मुठभेड़ की जांच सीबीआई को सौंप दी है। अदालत ने पुलिस के घटनाक्रम को संदिग्ध और फर्जी पाया है।
- इलाहाबाद हाईकोर्ट ने श्रावस्ती एनकाउंटर मामले में सीबीआई जांच का आदेश दिया है।
- अदालत ने पुलिस द्वारा दर्ज कराई गई एफआईआर को प्रथम दृष्टया 'झूठा' माना है।
- जांच में यह देखा जाएगा कि क्या पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों का पालन किया था।
- जांच अधिकारी को SHO अश्विनी कुमार दुबे की सटीक निशानेबाजी की क्षमता का भी परीक्षण करना होगा।
उत्तर प्रदेश के श्रावस्ती जिले में हुए एक कथित पुलिस मुठभेड़ के मामले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक बड़ा निर्णय लेते हुए केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) को मामले की गहन जांच करने का निर्देश दिया है। अदालत ने पुलिस द्वारा प्रस्तुत किए गए आधिकारिक विवरण में गंभीर विसंगतियां और संदेहजनक तथ्य पाए हैं।
यह पूरा मामला चोटकाऊ उर्फ अलाउद्दीन नामक व्यक्ति से जुड़ा है, जिसे मई 2025 में पुलिस द्वारा कथित मुठभेड़ के दौरान दोनों पैरों में गोली लगने के बाद गिरफ्तार किया गया था। अदालत ने इस बात पर सवाल उठाया कि कैसे 23 पुलिसकर्मियों की एक भारी-भरकम टीम, जिसमें 10 SWAT (विशेष हथियार और रणनीति) यूनिट के सदस्य शामिल थे, एक ई-रिक्शा पर सवार व्यक्ति को नहीं रोक सकी, जिसके पास कथित तौर पर केवल एक देसी कट्टा और दो कारतूस थे।
Why This Matters
BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि यह मामला कानून प्रवर्तन एजेंसियों की जवाबदेही और 'फर्जी मुठभेड़ों' (Fake Encounters) के बढ़ते चलन पर एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा करता है। यदि पुलिस का आधिकारिक नैरेटिव अदालत द्वारा संदिग्ध पाया जाता है, तो यह राज्य की कानून व्यवस्था और पुलिस की कार्यप्रणाली की विश्वसनीयता पर गंभीर संकट पैदा करता है।
अदालत का यह रुख पुलिस मुठभेड़ों के मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित सख्त दिशा-निर्देशों के अनुपालन की आवश्यकता को रेखांकित करता है।
न्यायमूर्ति सुभाष विद्यार्थी की एकल पीठ ने 13 अगस्त के अपने आदेश में सीबीआई को तीन महीने के भीतर जांच रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया है। अदालत ने विशेष रूप से तत्कालीन इकाउना थाना प्रभारी (SHO) अश्विनी कुमार दुबे की निशानेबाजी की जांच करने को कहा है। सीबीआई को यह आकलन करना होगा कि क्या दुबे रात के अंधेरे में, केवल हथियार लोड होने की आवाज सुनकर, 15 मीटर की दूरी से अपनी 9 मिमी सर्विस पिस्टल से सटीक निशाना लगा सकते थे।
घटनाक्रम के अनुसार, पुलिस का दावा था कि आरोपी नेपाल भागने की कोशिश कर रहा था। पुलिस ने प्राथमिकी (FIR) में कहा कि जब उन्होंने घेराबंदी की, तो आरोपी ने उन पर फायरिंग की, जिसके जवाब में SHO ने आत्मरक्षा में दो गोलियां चलाईं। हालांकि, अदालत ने इस कहानी को अविश्वसनीय माना है।
Frequently Asked Questions
1. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सीबीआई जांच का आदेश क्यों दिया?
अदालत ने पाया कि पुलिस द्वारा दर्ज कराई गई एफआईआर में विसंगतियां हैं और यह सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों का पालन नहीं करती है।
2. जांच का मुख्य केंद्र क्या है?
जांच का मुख्य केंद्र यह देखना है कि क्या मुठभेड़ वास्तविक थी और क्या SHO ने आत्मरक्षा के नाम पर गोली चलाई या यह एक सुनियोजित फर्जी एनकाउंटर था।