सुप्रीम कोर्ट ने NEET-UG विरोध प्रदर्शनों के दौरान पुलिस की कथित अत्यधिक बल प्रयोग और हिंसा की जांच के लिए न्यायमूर्ति आर. सुभाष रेड्डी के नेतृत्व में एक उच्चाधिकार प्राप्त जांच समिति (HPEC) का गठन किया है।
- न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) आर. सुभाष रेड्डी समिति का नेतृत्व करेंगे।
- जांच का मुख्य उद्देश्य पुलिस द्वारा बल प्रयोग और छात्रों के साथ दुर्व्यवहार की जांच करना है।
- समिति महिला प्रदर्शनकारियों के खिलाफ लक्षित हिंसा और उत्पीड़न के आरोपों की प्राथमिकता से जांच करेगी।
- पुलिस अधिकारियों पर हिंसा और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाने के आरोपों की भी जांच की जाएगी।
नई दिल्ली: भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने गुरुवार, 20 अगस्त 2026 को एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए देश भर में हो रहे NEET-UG छात्र प्रदर्शनों के दौरान हुई हिंसा और पुलिस की कार्यप्रणाली की जांच के लिए एक उच्चाधिकार प्राप्त जांच समिति (HPEC) के गठन का आदेश दिया है। यह निर्णय प्रदर्शनकारियों के संवैधानिक अधिकारों और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के बीच संतुलन बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
इस शक्तिशाली समिति का नेतृत्व सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) आर. सुभाष रेड्डी करेंगे। समिति में कानूनी और सुरक्षा विशेषज्ञों का एक दिग्गज समूह शामिल है, जिसमें पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति रवि शंकर झा, दिल्ली उच्च न्यायालय की पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति शालिंदर कौर, सीबीआई के पूर्व निदेशक ऋषि कुमार शुक्ला और मेघालय के सेवानिवृत्त महानिदेशक पुलिस डॉ. एल.आर. बिश्नोई शामिल हैं।
जांच के प्रमुख बिंदु
न्यायालय ने याचिकाकर्ताओं द्वारा उठाए गए कई गंभीर मुद्दों को जांच के दायरे में रखा है। इनमें पुलिस द्वारा बिना पर्याप्त चेतावनी के पेलेट गन, इलेक्ट्रिक बैटन, लाठी चार्ज और आंसू गैस का उपयोग शामिल है, जिससे प्रदर्शनकारियों को गंभीर और स्थायी शारीरिक चोटें आईं। समिति को यह भी देखना होगा कि क्या पुलिस का बल प्रयोग आनुपातिक था या यह प्रदर्शनकारियों के शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार का उल्लंघन था।
विशेष रूप से, न्यायालय ने महिला प्रदर्शनकारियों के खिलाफ लक्षित हिंसा, उत्पीड़न और छेड़छाड़ के आरोपों की प्राथमिकता के आधार पर जांच करने का निर्देश दिया है। इसके अलावा, समिति को यह भी जांचना होगा कि क्या पुलिस द्वारा प्रदर्शनकारियों की निगरानी और निगरानी (surveillance) उनके गोपनीयता के अधिकार का उल्लंघन करती है।
Why This Matters
BozokMedia विश्लेषण के अनुसार, यह मामला केवल छात्र विरोध तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत में नागरिक स्वतंत्रता और राज्य की शक्ति के बीच के संघर्ष को दर्शाता है। यदि पुलिस द्वारा कानून का दुरुपयोग (जैसे कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 163 का अत्यधिक उपयोग) किया जाता है, तो यह भविष्य में लोकतांत्रिक विरोध प्रदर्शनों के लिए एक 'चिलिंग इफेक्ट' पैदा कर सकता है।
न्यायपालिका की यह सक्रियता सुनिश्चित करेगी कि कानून व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर संवैधानिक अधिकारों की बलि न दी जाए।
दूसरी ओर, समिति को पुलिस अधिकारियों के विरुद्ध किए गए हमलों और प्रदर्शनकारियों द्वारा सार्वजनिक संपत्ति को पहुँचाए गए नुकसान की भी जांच करनी होगी। पुलिस कर्मियों को लगी चोटों और उनके परिवारों को हुए मानसिक आघात को भी विचारणीय बनाया गया है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
भारत में छात्र आंदोलनों का इतिहास रहा है, लेकिन हाल के वर्षों में NEET जैसी परीक्षाओं में अनियमितताओं के आरोपों ने प्रदर्शनों को और अधिक उग्र बना दिया है। पुलिस द्वारा बल प्रयोग और प्रदर्शनकारियों के अधिकारों के हनन को लेकर अदालतों में मामले बढ़ने से अब न्यायिक हस्तक्षेप अनिवार्य हो गया है।
Frequently Asked Questions
1. इस समिति का मुख्य उद्देश्य क्या है?
इसका उद्देश्य छात्र प्रदर्शनों के दौरान पुलिस द्वारा किए गए कथित अत्यधिक बल प्रयोग और प्रदर्शनकारियों द्वारा की गई हिंसा दोनों की निष्पक्ष जांच करना है।
2. क्या समिति के पास सजा देने की शक्ति है?
समिति एक जांच निकाय है जो अपनी रिपोर्ट अदालत को सौंपेगी, जिसके आधार पर न्यायालय आगे की कार्रवाई तय करेगा।