एडवोकेट जनरल विजय नारायण ने अदालत को बताया कि मद्रास उच्च न्यायालय परिसर में बिजली की आपूर्ति कभी बाधित नहीं होती है। उन्होंने सब-स्टेशन के महत्व और बुनियादी ढांचे की तकनीकी आवश्यकताओं पर विस्तार से चर्चा की।

  • मद्रास उच्च न्यायालय परिसर में वर्तमान में 5,500 KVA का स्वीकृत भार है।
  • निर्माण कार्यों के लिए 2,500 KVA के अतिरिक्त भार की मांग की गई है।
  • अदालत ने बिजली सब-स्टेशन को हटाने की जनहित याचिका (PIL) को खारिज कर दिया है।
  • सब-स्टेशन अस्पताल और रेलवे जैसे महत्वपूर्ण संस्थानों को भी बिजली प्रदान करता है।

चेन्नई में मद्रास उच्च न्यायालय परिसर की बिजली आपूर्ति की स्थिरता पर एक महत्वपूर्ण कानूनी बहस हुई। एडवोकेट जनरल (A-G) विजय नारायण ने अदालत के समक्ष तर्क दिया कि परिसर में बिजली की आपूर्ति कभी भी एक मिनट के लिए भी बाधित नहीं होती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह निर्बाध सेवा तमिलनाडु पावर डिस्ट्रीब्यूशन कॉरपोरेशन लिमिटेड (TNPDCL) द्वारा स्थापित मजबूत बुनियादी ढांचे के कारण संभव है, जो बेसिन ब्रिज गैस टरबाइन और सेवन वेल्स सब-स्टेशन जैसे कई ग्रिड स्रोतों से ऊर्जा प्राप्त करता है।

तकनीकी आवश्यकताएं और विस्तार

अदालत को सूचित किया गया कि उच्च न्यायालय परिसर के पास वर्तमान में 5,500 KVA का स्वीकृत भार है। इसके अतिरिक्त, परिसर में चल रहे निर्माण और नवीनीकरण कार्यों को देखते हुए, रजिस्ट्री ने 2,500 KVA के अतिरिक्त भार के लिए आवेदन (indent) भी जमा किया है। ए-जी ने जोर देकर कहा कि इतनी उच्च मांग के बावजूद, तकनीकी व्यवस्था इतनी सुदृढ़ है कि बिजली की कटौती की कोई गुंजाइश नहीं है।

विवाद की जड़: जनहित याचिका (PIL)

यह मामला एडवोकेट एम.टी. अरुनन द्वारा दायर एक जनहित याचिका से उपजा है। याचिकाकर्ता ने दावा किया था कि 1990 में 110/33/11 KV एस्प्लेनेड सब-स्टेशन स्थापित करने के लिए आवंटित जमीन के एक बड़े हिस्से का उपयोग नहीं किया जा रहा है और यह खाली पड़ा है। याचिका में तर्क दिया गया कि इस खाली जमीन का उपयोग कोर्ट हॉल या पार्किंग के लिए किया जाना चाहिए।

Why This Matters

BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि यह मामला केवल भूमि विवाद का नहीं है, बल्कि महत्वपूर्ण सार्वजनिक उपयोगिता सेवाओं और शहरी नियोजन के बीच संतुलन का है। यदि इस सब-स्टेशन को स्थानांतरित किया जाता है, तो न केवल उच्च न्यायालय बल्कि चेन्नई के महत्वपूर्ण संस्थान भी संकट में पड़ सकते हैं।

महत्वपूर्ण सार्वजनिक बुनियादी ढांचे को हटाना तकनीकी रूप से अव्यवहार्य और जोखिम भरा हो सकता है।

ए-जी ने तर्क दिया कि ट्रांसफार्मर के बीच खाली जगह रखना अनिवार्य सुरक्षा मानक है, जो भारी क्रेन और रखरखाव के वाहनों के लिए आवश्यक है। उन्होंने यह भी बताया कि यह सब-स्टेशन केवल न्यायालय ही नहीं, बल्कि राजीव गांधी सरकारी जनरल अस्पताल, चेन्नई पोर्ट ट्रस्ट और दक्षिणी रेलवे जैसे महत्वपूर्ण संस्थानों को भी बिजली पहुंचाता है।

अदालत का निर्णय

मुख्य न्यायाधीश सुश्रुत अरविंद धर्माधिकारी और न्यायमूर्ति जी. अरुल मुरुगन की खंडपीठ ने याचिका को खारिज करते हुए कहा कि बिजली वितरण जैसे सार्वजनिक उपयोगिता सेवाओं को तकनीकी व्यवहार्यता के बिना बाधित नहीं किया जा सकता। अदालत ने माना कि सब-स्टेशन को हटाना तकनीकी रूप से अव्यावहारिक होगा और इससे आपातकालीन सेवाओं को खतरा हो सकता है।

Did You Know?: मद्रास उच्च न्यायालय भारत के सबसे पुराने और प्रतिष्ठित उच्च न्यायालयों में से एक है, जो अपनी वास्तुकला के लिए प्रसिद्ध है।

Frequently Asked Questions

1. मद्रास उच्च न्यायालय में बिजली की आपूर्ति क्यों महत्वपूर्ण है?
न्यायालय की निरंतर कार्यप्रणाली और महत्वपूर्ण कानूनी प्रक्रियाओं को बिना किसी बाधा के चलाने के लिए निर्बाध बिजली आवश्यक है।

2. अदालत ने PIL को क्यों खारिज कर दिया?
अदालत ने पाया कि सब-स्टेशन को स्थानांतरित करना तकनीकी रूप से कठिन है और इससे अस्पताल जैसे आपातकालीन सेवाओं को नुकसान पहुँच सकता है।