जम्मू-कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय ने गांधी नगर में एक शराब की दुकान को संचालित करने की अनुमति देते हुए निवासियों की आपत्तियों को 'चयनात्मक' करार दिया है। अदालत ने कहा कि क्षेत्र पूरी तरह से आवासीय नहीं है और अन्य व्यावसायिक प्रतिष्ठान भी वहां मौजूद हैं।
- जम्मू-कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय ने गांधी नगर शराब वेंड के संचालन पर रोक हटा दी है।
- न्यायालय ने निवासियों की आपत्तियों को 'चयनात्मक' (selective) बताते हुए कहा कि वे अन्य दुकानों पर सवाल नहीं उठा रहे हैं।
- अदालत ने माना कि गांधी नगर का वह क्षेत्र पूरी तरह से आवासीय नहीं है, वहां कई व्यावसायिक प्रतिष्ठान भी हैं।
- सफल बोलीदाता को आबकारी नीति 2026-2027 के तहत अपने अधिकारों का उपयोग करने की अनुमति दी गई है।
जम्मू-कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय ने जम्मू के गांधी नगर इलाके में एक शराब की दुकान (liquor vend) के संचालन को रोकने के आदेश को रद्द कर दिया है। न्यायमूर्ति संजय परिहार की पीठ ने यह महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए कहा कि स्थानीय निवासियों द्वारा उठाई गई आपत्तियां 'चयनात्मक' थीं। अदालत ने पाया कि निवासी केवल इसी विशिष्ट दुकान को निशाना बना रहे थे, जबकि उनके आसपास अन्य शराब की दुकानें भी सुचारू रूप से चल रही थीं।
यह मामला तब शुरू हुआ जब गांधी नगर के निवासियों ने आरोप लगाया कि शराब की दुकान के कारण शाम के समय क्षेत्र में असामाजिक तत्वों और नशेड़ियों का जमावड़ा रहता है, जिससे महिलाओं की सुरक्षा और आवाजाही प्रभावित होती है। निवासियों का दावा था कि यह एक शुद्ध आवासीय क्षेत्र है, इसलिए वहां शराब की दुकान नहीं होनी चाहिए। हालांकि, अदालत ने इन दावों को खारिज कर दिया।
Why This Matters
BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि यह मामला प्रशासनिक निरंतरता और व्यावसायिक अधिकारों के बीच संतुलन को रेखांकित करता है। जब सरकार एक बार लाइसेंस या बोली प्रक्रिया पूरी कर लेती है, तो बिना किसी ठोस कानूनी आधार के स्थानीय विरोध के आधार पर उसे रोकना 'कानून के शासन' के विरुद्ध हो सकता है। यह निर्णय स्पष्ट करता है कि प्रशासनिक कार्रवाई में निष्पक्षता और एकरूपता होनी चाहिए।
न्यायालय का यह रुख दर्शाता है कि व्यक्तिगत विरोध को नीतिगत निर्णयों और वैध व्यावसायिक अधिकारों के ऊपर प्राथमिकता नहीं दी जा सकती।
अदालत ने यह भी नोट किया कि याचिकाकर्ता, जो आबकारी विभाग द्वारा आयोजित ई-ऑक्शन में सफल बोलीदाता था, आबकारी नीति 2026-2027 के तहत निष्पक्ष और गैर-भेदभावपूर्ण व्यवहार का हकदार है। अदालत ने पाया कि विभाग का व्यवहार असंगत था—एक तरफ उन्होंने बोली प्रक्रिया पूरी की, और दूसरी तरफ निवासियों के दबाव में आकर विक्रेता को स्थान बदलने के लिए मजबूर करने लगे।
ऐतिहासिक संदर्भ में देखें तो, आबकारी विभाग अक्सर स्थानीय विरोध के कारण लाइसेंस रद्द करने की कोशिश करता है, लेकिन यदि व्यवसाय पिछले वर्षों से उसी स्थान पर चल रहा है, तो नए 'अनापत्ति प्रमाण पत्र' (NOC) की आवश्यकता नहीं होती है। अदालत ने पाया कि गांधी नगर में पहले से ही KFC और अन्य बड़े खाद्य प्रतिष्ठान जैसे 'गणपति फूड जंक्शन' कार्यरत हैं, जो यह साबित करता है कि यह क्षेत्र केवल आवासीय नहीं है।
Frequently Asked Questions
1. उच्च न्यायालय ने निवासियों की आपत्तियों को 'चयनात्मक' क्यों कहा?
क्योंकि निवासी केवल इस विशिष्ट दुकान का विरोध कर रहे थे, जबकि आसपास की अन्य समान शराब की दुकानों पर कोई आपत्ति नहीं जताई गई थी।
2. क्या यह क्षेत्र पूरी तरह से आवासीय है?
नहीं, अदालत के अनुसार वहां KFC और अन्य व्यावसायिक दुकानें पहले से ही मौजूद हैं, जिससे यह साबित होता है कि यह मिश्रित उपयोग वाला क्षेत्र है।