राजस्थान के भरतपुर में एक दलित परिवार पर हमले और भूमि अतिक्रमण के मामले में जांच में छह बार बदलाव होने के बाद हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने जांच अधिकारियों और पर्यवेक्षी समिति से देरी के कारणों पर हलफनामा मांगा है।
- भरतपुर के एक दलित परिवार पर हमले की जांच पिछले दो वर्षों से लंबित है।
- जांच प्रक्रिया के दौरान छह अलग-अलग जांच अधिकारियों को मामला सौंपा गया।
- हाईकोर्ट ने 60 दिनों के भीतर जांच पूरी न होने पर अधिकारियों से जवाब मांगा है।
- SC/ST अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत पर्यवेक्षी समिति की विफलता पर भी सवाल उठे हैं।
राजस्थान उच्च न्यायालय ने भरतपुर जिले के एक दलित परिवार पर हुए कथित हमले और भूमि अतिक्रमण के मामले में गंभीर हस्तक्षेप किया है। मामले की जांच पिछले दो साल में छह बार बदल चुकी है, जिसके कारण न्याय प्रक्रिया में अत्यधिक देरी हुई है। अदालत ने इस विफलता को देखते हुए जांच अधिकारियों और पर्यवेक्षी समिति से जवाब तलब किया है।
पीड़ित जितेंद्र कुमार ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर निष्पक्ष जांच और चार्जशीट दाखिल करने की मांग की थी। मामला मई 2024 में शुरू हुआ था, जब कैर गांव में राजनीतिक रूप से प्रभावशाली लोगों ने कथित तौर पर उनके परिवार पर हमला किया था ताकि उनकी कृषि भूमि पर कब्जा किया जा सके।
Why This Matters
BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि इस मामले में प्रशासनिक शिथिलता केवल एक जांच की विफलता नहीं है, बल्कि यह SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत निर्धारित वैधानिक सुरक्षा उपायों के उल्लंघन का एक गंभीर मामला है। जब जांच बार-बार बदलती है, तो यह पीड़ित के लिए मानसिक उत्पीड़न का कारण बनती है और अपराधियों को बचने का मौका देती है।
न्यायमूर्ति शुभा मेहता की जयपुर पीठ ने टिप्पणी की कि जांच को समय पर पूरा करने में विफलता "चिंताजनक" है। अदालत ने लोक अभियोजक को निर्देश दिया है कि वे सभी नामित जांच अधिकारियों से हलफनामा प्राप्त करें कि जांच 60 दिनों के भीतर क्यों पूरी नहीं की गई।
जांच में बार-बार बदलाव और पर्यवेक्षी तंत्र की अनुपस्थिति न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध है।
अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के तहत, जांच को 60 दिनों के भीतर पूरा किया जाना अनिवार्य है। हालांकि, इस मामले में एक सर्कल ऑफिसर से लेकर पांच अतिरिक्त पुलिस अधीक्षकों तक ने जांच की जिम्मेदारी संभाली, लेकिन कोई निष्कर्ष नहीं निकला।
सेंटर फॉर दलित राइट्स (CDR) ने अदालत के आदेश का स्वागत करते हुए कहा कि यदि पर्यवेक्षी समिति नियमित बैठकें करती, तो आरोपियों को अब तक गिरफ्तार किया जा जा चुका होता। इस समिति में गृह सचिव और पुलिस महानिदेशक जैसे उच्च अधिकारी शामिल होते हैं, लेकिन उनकी निष्क्रियता पर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं।
Frequently Asked Questions
प्रश्न 1: हाईकोर्ट ने अधिकारियों से क्या मांगा है?
उत्तर: हाईकोर्ट ने जांच अधिकारियों और पर्यवेक्षी समिति से हलफनामा मांगा है कि जांच में देरी क्यों हुई और 60 दिनों की अनिवार्य सीमा का पालन क्यों नहीं किया गया।
प्रश्न 2: इस मामले में मुख्य आरोपी कौन हैं?
उत्तर: मामले में गुर्जर समुदाय के 12 व्यक्तियों पर दंगा करने, हत्या के प्रयास और आपराधिक अतिचार जैसे गंभीर आरोप लगाए गए हैं।