सुप्रीम कोर्ट की नौ न्यायाधीशों की पीठ ने 'उद्योग' की परिभाषा के लिए ऐतिहासिक 'ट्रिपल टेस्ट' को नए औद्योगिक संबंध कोड (IRC) के संदर्भ में दरकिनार कर दिया है, जिससे कानूनी अनिश्चितता पैदा हो गई है।

  • सुप्रीम कोर्ट ने 'बैंगलोर वाटर सप्लाई' मामले के 'ट्रिपल टेस्ट' को नए औद्योगिक संबंध कोड (IRC) के लिए आधार मानने से इनकार कर दिया।
  • न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना सहित चार न्यायाधीशों ने इस फैसले पर असहमति जताई।
  • विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय श्रमिकों के सुरक्षा कवच को कमजोर कर सकता है।

भारत के सर्वोच्च न्यायालय की एक नौ-न्यायाधीशों की पीठ ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है, जिसने औद्योगिक विवादों के समाधान के लिए दशकों से चले आ रहे कानूनी ढांचे को हिलाकर रख दिया है। 20 अगस्त को दिए गए इस फैसले में, न्यायालय ने 1978 के ऐतिहासिक बैंगलोर वाटर सप्लाई एंड सीवरेज बोर्ड बनाम ए. राजप्पा (BWSSB) मामले में निर्धारित 'ट्रिपल टेस्ट' को नए औद्योगिक संबंध कोड (IRC), 2020 की व्याख्या के लिए 'एंकर' (आधार) मानने से इनकार कर दिया है।

बता दें कि 'ट्रिपल टेस्ट' के अनुसार, किसी भी गतिविधि को 'उद्योग' मानने के लिए तीन शर्तें पूरी होनी चाहिए थीं: एक व्यवस्थित गतिविधि, नियोक्ता-कर्मचारी सहयोग, और मानवीय आवश्यकताओं (धार्मिक या आध्यात्मिक को छोड़कर) को पूरा करने के लिए वस्तुओं या सेवाओं का उत्पादन/वितरण। इस परीक्षण में लाभ का उद्देश्य मायने नहीं रखता था, बल्कि गतिविधि की प्रकृति महत्वपूर्ण थी।

क्यों यह फैसला महत्वपूर्ण है?

BozokMedia विश्लेषण दर्शाता है कि यह निर्णय केवल कानूनी व्याख्या तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके व्यापक सामाजिक और आर्थिक निहितार्थ हैं। 1991 के उदारीकरण और निजीकरण के बाद से, बड़ी संख्या में श्रमिक सार्वजनिक क्षेत्र की सुरक्षा छोड़कर निजी क्षेत्र में चले गए हैं। ऐसे में 'उद्योग' की एक व्यापक परिभाषा श्रमिकों के लिए सुरक्षा कवच का काम करती थी।

'ट्रिपल टेस्ट' केवल श्रमिकों के पक्ष में नहीं था, बल्कि इसने नियोक्ताओं के लिए छंटनी और बंदी की प्रक्रियाओं को विनियमित करके औद्योगिक शांति बनाए रखने में मदद की थी।

न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना ने अपने असहमतिपूर्ण मत में तर्क दिया कि इस संदर्भ की आवश्यकता ही नहीं थी और 'ट्रिपल टेस्ट' में हस्तक्षेप की कोई आवश्यकता नहीं है। उनके विचार से तीन अन्य न्यायाधीश भी सहमत थे। न्यायालय के बहुमत का तर्क है कि चूंकि पुराना औद्योगिक विवाद अधिनियम (ID Act) अब निरस्त हो चुका है, इसलिए नए कोड की व्याख्या के लिए पुराने सिद्धांतों का पालन करना अनिवार्य नहीं है।

हालांकि, विरोधाभास यह है कि नया औद्योगिक संबंध कोड (IRC) भी काफी हद तक उसी 'ट्रिपल टेस्ट' के सार को समाहित करता है। यदि कानून का मूल उद्देश्य समान है, तो व्याख्या के आधार को हटा देना कानूनी भ्रम की स्थिति पैदा कर सकता है।

Did You Know?: 1978 के BWSSB मामले में जस्टिस वी.आर. कृष्ण अय्यर ने 'उद्योग' की परिभाषा को इतना व्यापक बनाया था कि इसमें कई गैर-लाभकारी संस्थाएं भी शामिल हो गईं।

Frequently Asked Questions

1. 'ट्रिपल टेस्ट' क्या है?
यह तीन शर्तों का एक समूह है जो निर्धारित करता है कि कोई गतिविधि 'उद्योग' के अंतर्गत आती है या नहीं: व्यवस्थित गतिविधि, नियोक्ता-कर्मचारी संबंध, और सेवा/वस्तु का उत्पादन।

2. नए कानून (IRC) का क्या प्रभाव पड़ेगा?
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से नए कोड के तहत 'उद्योग' की परिभाषा को लेकर अदालतों और ट्रिब्यूनल में अनिश्चितता बढ़ सकती है।