पुणे के एक सिविल इंजीनियर युवराज कुमार शर्मा को एक बड़े बहु-राज्यीय इंजीनियरिंग दाखिला रैकेट को संचालित करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया है। यह सिंडिकेट फर्जी कॉल सेंटरों और सोशल मीडिया के जरिए माता-पिता को मैनेजमेंट कोटे की सीटों का झांसा देकर लाखों रुपये की ठगी करता था।

  • एमआईटी पुणे के पूर्व छात्र युवराज कुमार शर्मा ने आईआईटी उम्मीदवारों और उनके माता-पिता को निशाना बनाकर मौसमी दाखिला घोटाला चलाया।
  • पोवई की एक महिला से आईआईआईटी हैदराबाद में सीट दिलाने के नाम पर 16.5 लाख रुपये की ठगी के बाद इस रैकेट का भंडाफोड़ हुआ।
  • यह सिंडिकेट पुणे में दो फर्जी कॉल सेंटरों के जरिए काम करता था और कॉलेज की आधिकारिक सूचियां जारी होने से पहले ही गायब हो जाता था।

एक समय था जब वह खुद उसी सपने को लेकर कोटा गया था, जिसे पूरा करने के लिए हर साल हजारों छात्र वहां पहुंचते हैं—आईआईटी प्रवेश परीक्षा पास करना और एक सफल इंजीनियर बनना। हालांकि, 35 वर्षीय युवराज कुमार शर्मा उर्फ सोनू कुमार आईआईटी में जगह बनाने में असमर्थ रहा। उसने अंततः 2016 में पुणे के एमआईटी एकेडमी से सिविल इंजीनियरिंग की डिग्री पूरी की। लेकिन सालों बाद, पुलिस के अनुसार, वह एक ऐसा रैकेट चला रहा था जो ठीक उसी सपने का शिकार करता था जिसे उसने कभी खुद देखा था।

पुलिस का आरोप है कि जो काम एक कोचिंग सेंटर और एडमिशन कंसल्टेंसी के रूप में शुरू हुआ था, वह अंततः पुणे में दो फर्जी कॉल सेंटरों के माध्यम से संचालित होने वाला एक सुनियोजित मौसमी दाखिला रैकेट बन गया। यह गिरोह इंजीनियरिंग प्रवेश सत्र शुरू होते ही सक्रिय हो जाता था, सोशल मीडिया के जरिए चिंतित माता-पिता और छात्रों से संपर्क साधता था, प्रतिष्ठित कॉलेजों में सीटों का झूठा वादा करता था और एडमिशन लिस्ट घोषित होने से ठीक पहले रफूचक्कर हो जाता था।

इस तरह हुआ करोड़ों के घोटाले का पर्दाफाश

यह पूरा मामला तब सामने आया जब मुंबई के पोवई की एक 47 वर्षीय महिला, ग्रेसी पीटर स्वामी ने पुलिस से संपर्क किया और आरोप लगाया कि उनके साथ 16.5 लाख रुपये की ठगी की गई है। पीड़िता ने इंस्टाग्राम पर "techorbit1111" नामक एक अकाउंट देखा था, जिसके माध्यम से उनके बेटे को इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी (IIIT), हैदराबाद में प्रवेश दिलाने का झांसा दिया गया था। उन्होंने इसके लिए 16.5 लाख रुपये का भुगतान किया, लेकिन वादा किया गया एडमिशन कभी नहीं मिला।

पुलिस उपायुक्त दत्ता नलावड़े ने बताया कि पुलिस ने तुरंत बैंकों से संपर्क किया और स्वामी द्वारा ट्रांसफर की गई राशि में से 16 लाख रुपये फ्रीज करने में सफलता हासिल की। अदालती आदेश के बाद पूरी राशि पीड़िता को वापस कर दी गई है। इसके बाद जांचकर्ताओं ने डिजिटल सबूतों का पीछा किया और पुणे के विमान नगर, लोहेगांव और खराड़ी में छापेमारी कर इस रैकेट के कॉल सेंटरों का भंडाफोड़ किया, जहां 10 लोग काम करते हुए पाए गए।

पहलूवैध प्रवेश प्रक्रियाघोटाला सिंडिकेट की कार्यप्रणाली
भुगतान का तरीकाकॉलेज के आधिकारिक बैंक ड्राफ्ट या ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम सेनकद या पेट्रोल पंपों के जरिए घुमाकर किया गया डिजिटल ट्रांसफर
संपर्क का माध्यमसत्यापित आधिकारिक ईमेल और कॉलेज की आधिकारिक वेबसाइटफर्जी सिम कार्डों से बने इंस्टाग्राम और फेसबुक अकाउंट
बैठक का स्थानकॉलेज कैंपस के भीतर आधिकारिक प्रवेश सेलकैंपस के बाहर, कैफे या अनौपचारिक स्थान

Why This Matters

BozokMedia के विश्लेषण से पता चलता है कि भारत के उच्च शिक्षा क्षेत्र में अत्यधिक प्रतिस्पर्धा और प्रतिष्ठित संस्थानों में सीमित सीटें इस तरह के रैकेटों के फलने-फूलने का मुख्य कारण हैं। जब माता-पिता अपने बच्चों के भविष्य को लेकर अत्यधिक तनाव में होते हैं, तो वे अक्सर अनौपचारिक और अवैध माध्यमों का सहारा लेने के लिए तैयार हो जाते हैं, जिसका फायदा युवराज शर्मा जैसे तकनीकी रूप से सक्षम अपराधी उठाते हैं।

"प्रीमियर इंजीनियरिंग संस्थानों में सीट सुरक्षित करने का सामाजिक और पारिवारिक दबाव माता-पिता को बेहद संवेदनशील बना देता है, जिससे वे बिना किसी गहन जांच के बड़ी रकम सौंप देते हैं।"

मास्टरमाइंड की पृष्ठभूमि और कार्यशैली

बिहार के पटना जिले के पनेतलव का रहने वाला युवराज शर्मा गणित में काफी होशियार था। उसके दादाजी, जो खुद एक शिक्षक थे, ने उसे उच्च शिक्षा के लिए कोटा भेजा था। कोटा में तैयारी के दौरान वह अन्य छात्रों को गणित भी पढ़ाता था। आईआईटी में असफल होने के बाद, उसने पुणे से सिविल इंजीनियरिंग की। नौकरी न मिलने के बाद उसने शॉर्टकट अपनाया और इस सिंडिकेट का गठन किया।

यह गिरोह फर्जी सिम कार्डों का उपयोग करके सोशल मीडिया पर सक्रिय रहता था। जैसे ही कोई माता-पिता या छात्र इंजीनियरिंग एडमिशन को लेकर पूछताछ करता, वे उनसे संपर्क करते थे। वे खुद को कॉलेज प्रशासन का करीबी बताते थे और एडमिशन फीस के नाम पर नकद या पेट्रोल पंप मालिकों को कमीशन देकर डिजिटल मनी को कैश में बदलवाते थे। कॉलेज की लिस्ट आने से पहले ही वे अपने फोन और सिम कार्ड नष्ट कर गायब हो जाते थे। पुलिस ने अब तक ऐसे 30 मोबाइल नंबरों की पहचान की है और मुंबई, नागपुर, उत्तर प्रदेश और कर्नाटक में दर्ज मामलों से इसके तार जोड़े हैं।

क्या आप जानते हैं?: हर साल 12 लाख से अधिक छात्र आईआईटी की लगभग 17,000 सीटों के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं, जिससे इसकी चयन दर (लगभग 1.4%) हार्वर्ड विश्वविद्यालय की तुलना में भी कम हो जाती है।

Frequently Asked Questions

प्रश्न 1: इस घोटाले का शिकार होने से माता-पिता कैसे बच सकते हैं?
उत्तर: माता-पिता को केवल कॉलेज की आधिकारिक वेबसाइट और कैंपस के भीतर स्थित प्रवेश सेल के माध्यम से ही संपर्क करना चाहिए। किसी भी सोशल मीडिया विज्ञापनों या अनौपचारिक एजेंटों को नकद या व्यक्तिगत खातों में भुगतान करने से बचना चाहिए।

प्रश्न 2: यदि कोई इस तरह के घोटाले का शिकार हो जाता है, तो उसे तुरंत क्या करना चाहिए?
उत्तर: पीड़ित को तुरंत अपने नजदीकी साइबर अपराध पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज करानी चाहिए और संबंधित बैंकों को सूचित करना चाहिए ताकि समय रहते धोखाधड़ी से ट्रांसफर की गई राशि को फ्रीज किया जा सके।