सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश न्यायमूर्ति विक्रम नाथ ने सूरत में 'सिग्नल स्कूल बस' पहल का शुभारंभ किया, जो ट्रैफिक सिग्नल पर रहने वाले बच्चों को शिक्षा और समाज की मुख्यधारा से जोड़ने का काम करेगी।

  • 'सिग्नल स्कूल बस' पहल का उद्देश्य ट्रैफिक सिग्नल पर काम करने वाले बच्चों को शिक्षा से जोड़ना है।
  • न्यायमूर्ति विक्रम नाथ ने इसे बच्चों को समाज की मुख्यधारा से जोड़ने वाला एक 'मजबूत सेतु' बताया।
  • यह योजना अहमदाबाद की सफलता के बाद अब सूरत में भी लागू की जा रही है।
  • गुजरात हाई कोर्ट ने डिजिटल निगरानी के लिए 'GSLSA वॉर रूम' और 'ई-परमानेंट लोक अदालत' भी लॉन्च की है।

सूरत, गुजरात: समाज के हाशिए पर रहने वाले बच्चों के भविष्य को संवारने की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम उठाते हुए, सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश और राष्ट्रीय कानूनी सेवा प्राधिकरण (NALSA) के कार्यकारी अध्यक्ष न्यायमूर्ति विक्रम नाथ ने सूरत में 'सिग्नल स्कूल बस' परियोजना का शुभारंभ किया। यह पहल केवल एक वाहन नहीं है, बल्कि उन बच्चों के लिए आशा की एक किरण है जो अक्सर ट्रैफिक सिग्नल पर जीवन यापन करने को मजबूर होते हैं।

न्यायमूर्ति नाथ ने इस अवसर पर भावुक होते हुए कहा कि जब हम ट्रैफिक सिग्नल पर किसी बच्चे को देखते हैं, तो अक्सर हम उसे केवल मदद मांगते हुए देखते हैं और सिग्नल हरा होते ही आगे बढ़ जाते हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि हमें इन बच्चों को एक अलग और सम्मानजनक नजरिए से देखना चाहिए। उनके अनुसार, सिग्नल पर खड़ा बच्चा केवल एक भिखारी नहीं, बल्कि एक ऐसा बच्चा है जिसमें पढ़ने, खेलने और सपने देखने की क्षमता है।

शिक्षा को घर तक पहुँचाना

इस परियोजना की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह शिक्षा प्रणाली का इंतजार नहीं करती, बल्कि "शिक्षा को बच्चे के घर तक ले जाती है"। न्यायमूर्ति नाथ ने विस्तार से बताया कि इस पहल के माध्यम से पहले परिवारों से संपर्क किया जाता है, उन्हें बुनियादी शिक्षा और संस्कार दिए जाते हैं, और इसके बाद बच्चों का नियमित सरकारी स्कूल में दाखिला सुनिश्चित किया जाता है।

सिग्नल स्कूल बस केवल एक वाहन नहीं है, बल्कि बच्चों को समाज की मुख्यधारा से जोड़ने वाला एक मजबूत सेतु है।

गुजरात उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश सुनीता अग्रवाल ने इस अवसर पर कहा कि बच्चों का स्कूल में दाखिला कराना एक बात है, लेकिन सबसे बड़ी चुनौती उन्हें स्कूल छोड़ने (ड्रॉप-आउट) से रोकना है। उन्होंने बताया कि गुजरात राज्य कानूनी सेवा प्राधिकरण (GSLSA) बच्चों को शिक्षा की निरंतरता बनाए रखने के लिए लगातार प्रयासरत है।

तकनीकी और कानूनी सुधारों का संगम

सूरत में आयोजित इस कार्यक्रम के दौरान केवल स्कूल बस ही नहीं, बल्कि तीन महत्वपूर्ण परियोजनाओं का भी अनावरण किया गया। BozokMedia analysis shows कि गुजरात कानूनी सेवाओं में डिजिटल परिवर्तन की ओर एक बड़ा कदम है। इन परियोजनाओं में शामिल हैं:

  • GSLSA वॉर रूम: गुजरात उच्च न्यायालय में एक डिजिटल निगरानी कक्ष, जो 32 जिलों और 4,200 से अधिक पैरालीगल स्वयंसेवकों (PLVs) की वास्तविक समय में निगरानी करेगा।
  • ई-परमानेंट लोक अदालत (E-PLA): एक पेपरलेस पोर्टल-आधारित अदालत जिसे सूरत, अहमदाबाद, राजकोट और वडोदरा क्लस्टर में लॉन्च किया गया है।
  • सिग्नल स्कूल बस: वंचित बच्चों को शिक्षा और स्वच्छता प्रशिक्षण प्रदान करने के लिए एक विशेष बस।

ऐतिहासिक रूप से, भारत में सड़क पर रहने वाले बच्चों की शिक्षा एक बड़ी चुनौती रही है। अहमदाबाद में इस मॉडल की सफलता के बाद, अब सूरत में भी बच्चों के जीवन में बदलाव लाने की तैयारी है।

क्या आप जानते हैं?: 'सिग्नल स्कूल' पहल का मुख्य उद्देश्य बच्चों को केवल साक्षर बनाना नहीं, बल्कि उन्हें समाज में सम्मान के साथ जीने के योग्य बनाना है।

Frequently Asked Questions

1. सिग्नल स्कूल बस क्या है?
यह एक विशेष मोबाइल शिक्षण इकाई है जो ट्रैफिक सिग्नल पर रहने वाले बच्चों तक शिक्षा, स्वच्छता और सामाजिक कौशल पहुँचाती है।

2. GSLSA वॉर रूम का क्या काम है?
यह एक डिजिटल तकनीक आधारित कमरा है जो गुजरात के 32 जिलों में कानूनी सहायता कार्यों की रीयल-टाइम निगरानी करता है।