सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुयान ने कहा है कि छात्रों को उनके विचारों या प्रश्नों के लिए दंडित करना असंवैधानिक है। उन्होंने लोकतंत्र में असहमति के अधिकार को अनिवार्य बताया।
- न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुयान ने छात्रों को डराने को सत्ता का दुरुपयोग बताया।
- लोकतंत्र में सवाल पूछना नागरिकता और संवैधानिक जिम्मेदारी का हिस्सा है।
- असहमति को खतरा मानना संविधान की भावना के विरुद्ध है।
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुयान ने लोकतंत्र की नींव को लेकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी (NLU), दिल्ली के 13वें एलएलएम बैच के दीक्षांत समारोह में बोलते हुए, न्यायमूर्ति भुयान ने स्पष्ट रूप से कहा कि छात्रों को उनके अलग दृष्टिकोण या प्रश्न पूछने के लिए दंडात्मक कार्रवाई की धमकी देना न केवल असंवैधानिक है, बल्कि यह पद और शक्ति का घोर दुरुपयोग भी है।
न्यायमूर्ति भुयान ने जोर देकर कहा कि एक जीवंत लोकतंत्र में, प्रश्न पूछना अवज्ञा का कार्य नहीं है। इसके विपरीत, यह नागरिकता, स्वतंत्रता और संवैधानिक जिम्मेदारी की एक आवश्यक अभिव्यक्ति है। उन्होंने कहा कि शैक्षणिक वातावरण में सभी का एक ही निष्कर्ष पर पहुंचना आवश्यक नहीं है; बल्कि वहां विभिन्न विचारों के आदान-प्रदान और बहस की गुंजाइश होनी चाहिए।
क्यों महत्वपूर्ण है यह बयान?
BozokMedia विश्लेषण के अनुसार, न्यायमूर्ति भुयान का यह बयान हालिया विवादों के बीच आया है, जहाँ बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) द्वारा NALSAR यूनिवर्सिटी के छात्रों के नामांकन को लेकर निर्देश दिए गए थे। यह टिप्पणी शैक्षणिक स्वतंत्रता और संस्थानों की जवाबदेही के बीच बढ़ते तनाव को रेखांकित करती है।
"एक लोकतांत्रिक समाज इस आधार पर नहीं बनाया जा सकता कि हर कोई एक जैसा सोचेगा। यह इस समझ पर आधारित है कि मतभेद रहेंगे और उन्हें संवैधानिक ढांचे के भीतर समाहित किया जाना चाहिए।"
न्यायमूर्ति ने 'असहिष्णुता' को एक प्रकार की हिंसा बताया। उन्होंने चेतावनी दी कि जब असहमति को चुप कराने, खारिज करने या दंडित करने का प्रयास किया जाता है, तो यह उस संवैधानिक ढांचे को कमजोर करता है जो बोलने और अलग तरह से सोचने की स्वतंत्रता की रक्षा करता है। उन्होंने विश्वविद्यालयों को स्वतंत्र विचार का प्रारंभिक बिंदु बताते हुए कहा कि यहाँ विचारों का परीक्षण और बहस के माध्यम से किया जाना चाहिए।
ऐतिहासिक संदर्भ
भारत में शैक्षणिक संस्थानों और राजनीतिक/कानूनी हस्तक्षेप के बीच संघर्ष का इतिहास रहा है। हाल के वर्षों में, विभिन्न विश्वविद्यालयों के दीक्षांत समारोहों में मुख्य न्यायाधीशों या अन्य गणमान्य व्यक्तियों की उपस्थिति को लेकर विवाद देखे गए हैं, जो छात्रों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और संस्थागत प्रोटोकॉल के बीच टकराव को दर्शाते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. न्यायमूर्ति भुयान के अनुसार असहमति क्या है?
उनके अनुसार, असहमति लोकतंत्र का एक आवश्यक हिस्सा है और इसे खतरे के रूप में नहीं, बल्कि संवैधानिक ढांचे के भीतर विविधता के रूप में देखा जाना चाहिए।
2. छात्रों को डराने के क्या परिणाम हो सकते हैं?
न्यायमूर्ति ने कहा कि छात्रों को डराना असंवैधानिक है और यह शैक्षणिक संस्थानों में स्वतंत्र सोच के विकास को रोकता है।