बॉम्बे हाई कोर्ट ने 83 वर्षीय बुजुर्ग पिता के साथ मारपीट और दुर्व्यवहार करने वाले 52 वर्षीय बेटे की बेदखली के आदेश को सही ठहराया है। कोर्ट ने कहा कि बुजुर्गों का गरिमा के साथ जीना उनका मौलिक अधिकार है।

  • बॉम्बे हाई कोर्ट ने मुंबई के कलिना स्थित घर से 52 वर्षीय बेटे की बेदखली के आदेश को बरकरार रखा।
  • CCTV फुटेज और मेडिकल रिकॉर्ड्स ने बेटे द्वारा पिता के साथ मारपीट के दावों की पुष्टि की।
  • कोर्ट ने स्पष्ट किया कि 'माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण अधिनियम, 2007' बुजुर्गों की सुरक्षा के लिए है।
  • भाई-बहनों के बीच संपत्ति विवाद, माता-पिता के साथ हिंसा का आधार नहीं हो सकते।

बुजुर्गों के अधिकारों की रक्षा करते हुए बॉम्बे हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने एक 52 वर्षीय व्यक्ति की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उसने अपने 83 वर्षीय पिता के घर से अपनी बेदखली के आदेश को चुनौती दी थी। जस्टिस एन जे जमादार ने याचिकाकर्ता के व्यवहार को "निंदनीय" बताते हुए कहा कि किसी भी बच्चे को अपने बुजुर्ग माता-पिता के शांतिपूर्ण और गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार को खतरे में डालने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

यह मामला तब शुरू हुआ जब एक 83 वर्षीय पिता ने माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम, 2007 के तहत ट्रिब्यूनल का दरवाजा खटखटाया। पिता ने आरोप लगाया कि उनका बेटा शराब का आदी है, स्वभाव से हिंसक है और बार-बार उनके तथा परिवार के अन्य सदस्यों के साथ मारपीट करता है। साथ ही, उन पर संपत्ति बेचने और पैसे देने के लिए लगातार दबाव बनाया जा रहा था।

यह क्यों महत्वपूर्ण है

BozokMedia के विश्लेषण के अनुसार, यह निर्णय एक महत्वपूर्ण कानूनी मिसाल कायम करता है: 2007 के अधिनियम के तहत "भरण-पोषण" का अर्थ केवल वित्तीय सहायता नहीं, बल्कि एक शांतिपूर्ण निवास का अधिकार भी है। बेदखली को बरकरार रखकर, कोर्ट ने यह संदेश दिया है कि पारिवारिक रिश्तों की आड़ में हिंसा को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा, और यह भी माना कि बुजुर्ग अक्सर शर्म या मोह के कारण अपने बच्चों के खिलाफ पुलिस रिपोर्ट दर्ज नहीं कराते।

सुनवाई के दौरान, अदालत ने विचलित करने वाले CCTV फुटेज और मेडिकल रिकॉर्ड्स देखे, जिन्होंने पिता के आरोपों की पुष्टि की। हालांकि बेटे ने तर्क दिया कि उसके भाई-भाभी ने साजिश रची है और वह अपने माता-पिता के चिकित्सा खर्चों का वहन करता था, लेकिन जस्टिस जमादार ने स्पष्ट किया कि आर्थिक सहायता देना हिंसा करने का लाइसेंस नहीं है।

"वरिष्ठ नागरिकों के लिए गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार, किसी भी बच्चे के पारिवारिक दावे या वित्तीय योगदान से ऊपर है।"

अदालत ने इस तर्क को भी खारिज कर दिया कि 13 वर्षों में केवल दो पुलिस शिकायतें दर्ज की गईं। कोर्ट ने कहा कि माता-पिता आमतौर पर अपने बच्चों के खिलाफ कानूनी रास्ता तभी अपनाते हैं जब सभी विकल्प खत्म हो जाते हैं और यह उनके लिए अंतिम उपाय होता है।

बेटे (याचिकाकर्ता) का तर्क कोर्ट की टिप्पणी/निष्कर्ष
आरोप भाई-बहनों द्वारा मनगढ़ंत हैं। CCTV फुटेज और मेडिकल रिकॉर्ड्स मारपीट का ठोस सबूत हैं।
माता-पिता के चिकित्सा खर्च उठाए। वित्तीय सहायता हिंसक व्यवहार को सही नहीं ठहरा सकती।
13 साल में केवल दो पुलिस शिकायतें। माता-पिता अंतिम विकल्प के रूप में ही पुलिस के पास जाते हैं।

अंततः, कोर्ट ने पाया कि बुजुर्ग पिता के जीवन में शांति और सामान्य स्थिति बहाल करने के लिए बेदखली का आदेश आवश्यक था। यह फैसला पुष्टि करता है कि वरिष्ठ नागरिक अधिनियम एक कल्याणकारी कानून है, जो बुजुर्गों को उनके अपने ही घर में उत्पीड़न से बचाने के लिए बनाया गया है।

क्या आप जानते हैं?: वरिष्ठ नागरिक अधिनियम, 2007 के तहत, यदि कोई बच्चा अपने माता-पिता की बुनियादी जरूरतों को पूरा नहीं करता, तो ट्रिब्यूनल संपत्ति के हस्तांतरण (Transfer) को शून्य घोषित कर सकता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. क्या एक वरिष्ठ नागरिक अपने बच्चे को अपने घर से निकाल सकता है?
हाँ, यदि बच्चे का व्यवहार ऐसा है कि माता-पिता शांति से नहीं रह सकते, तो 2007 के अधिनियम के तहत ट्रिब्यूनल बेदखली का आदेश दे सकता है।

2. क्या वित्तीय सहायता देने से बच्चा बेदखली से बच सकता है?
नहीं। जैसा कि इस मामले में देखा गया, चिकित्सा या बीमा खर्च उठाना शारीरिक या मानसिक प्रताड़ना का बचाव नहीं हो सकता।