कैलकत्ता उच्च न्यायालय ने एक छात्रा के डोमिसाइल सर्टिफिकेट को रोकने वाले अधिकारियों को फटकार लगाई है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि माँ का नाम वोटर लिस्ट में न होना, छात्रा की पात्रता को खत्म नहीं करता।

  • कैलकत्ता हाई कोर्ट ने WBJEE पास करने वाली छात्रा को डोमिसाइल सर्टिफिकेट जारी करने का आदेश दिया।
  • कोर्ट ने राज्य सरकार के इस तर्क को खारिज कर दिया कि माँ का नाम वोटर लिस्ट में न होने से छात्रा अपात्र है।
  • बांग्लादेश में MBBS की पढ़ाई के लिए पासपोर्ट बनवाने में आ रही बाधा को दूर करने के लिए भी कोर्ट ने निर्देश दिए।

एक महत्वपूर्ण न्यायिक हस्तक्षेप में, कैलकत्ता हाई कोर्ट ने राज्य अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वे उस छात्रा को तुरंत डोमिसाइल सर्टिफिकेट जारी करें जिसने West Bengal Joint Entrance Examination (WBJEE) पास किया है। अदालत ने पाया कि केवल इस आधार पर सर्टिफिकेट देने से इनकार करना कि छात्रा की माँ का नाम मतदाता सूची से हटा दिया गया था, पूरी तरह से अनुचित है।

जस्टिस कृष्णा राव की पीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि अधिकारियों के पास इस इनकार का कोई उचित आधार नहीं है। याचिकाकर्ता छात्रा ने NEET परीक्षा भी दी थी और उसे काउंसलिंग प्रक्रिया के लिए डोमिसाइल सर्टिफिकेट की सख्त जरूरत थी। छात्रा ने तर्क दिया कि वह पश्चिम बंगाल में ही जन्मी और पली-बढ़ी है और उसने अपनी 12वीं तक की शिक्षा इसी राज्य से पूरी की है।

राज्य अधिकारियों का तर्क था कि चूंकि माँ का नाम वोटर लिस्ट से हटा दिया गया है, इसलिए छात्रा डोमिसाइल सर्टिफिकेट की हकदार नहीं है। हालांकि, अदालत ने इस बात पर गौर किया कि छात्रा का अपना नाम मतदाता सूची में मौजूद है और उसने पिछले विधानसभा चुनाव में मतदान भी किया था। जस्टिस राव ने स्पष्ट किया कि डोमिसाइल सर्टिफिकेट जारी करते समय अधिकारियों को उस व्यक्ति की पहचान सत्यापित करनी होती है जिसने आवेदन किया है, न कि उसके माता-पिता की वोटर लिस्ट स्थिति का ऑडिट करना होता है।

यह मामला क्यों महत्वपूर्ण है?

BozokMedia के विश्लेषण के अनुसार, यह फैसला "प्रशासनिक हठधर्मिता" के खिलाफ एक बड़ी जीत है। जब सरकारी कार्यालय ठोस सबूतों (जैसे जन्म प्रमाण पत्र और शैक्षिक दस्तावेज) के बजाय केवल कागजी खानापूर्ति को प्राथमिकता देते हैं, तो यह छात्रों के भविष्य के लिए खतरा बन जाता है। यह निर्णय स्पष्ट करता है कि एक नागरिक के निवास अधिकार उसके माता-पिता की प्रशासनिक स्थिति पर निर्भर नहीं होते।

"न्यायपालिका अब उन नौकरशाही बाधाओं को हटाने के लिए सक्रिय हो रही है जो युवाओं के शैक्षणिक और पेशेवर करियर को बर्बाद कर रही हैं।"

अदालत ने अब संबंधित उप-मंडल अधिकारी (SDO) या उप-मंडल मजिस्ट्रेट (SDM) को आदेश दिया है कि यदि छात्रा अन्य सभी मानदंडों को पूरा करती है, तो एक सप्ताह के भीतर सर्टिफिकेट जारी किया जाए। इससे यह सुनिश्चित होगा कि छात्रा काउंसलिंग प्रक्रिया में अपना अवसर न खोए।

एक अन्य संबंधित मामले में, कोर्ट ने Special Intensive Revision (SIR) अपीलीय न्यायाधिकरण को निर्देश दिया कि वह एक महिला की अपील का निपटारा दो सप्ताह के भीतर करे। उस महिला के बेटे को बांग्लादेश में MBBS कोर्स करने के लिए पासपोर्ट की आवश्यकता थी, लेकिन माँ का नाम वोटर लिस्ट से हटने के कारण प्रक्रिया रुकी हुई थी।

क्या आप जानते हैं?: डोमिसाइल सर्टिफिकेट (निवास प्रमाण पत्र) भारत में एक महत्वपूर्ण कानूनी दस्तावेज है, जिसका उपयोग किसी विशेष राज्य के शैक्षणिक संस्थानों और सरकारी नौकरियों में आरक्षण लाभ प्राप्त करने के लिए किया जाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न 1: क्या माता-पिता के वोटर लिस्ट में न होने पर छात्र को डोमिसाइल सर्टिफिकेट देने से मना किया जा सकता है?
कैलकत्ता हाई कोर्ट के हालिया फैसले के अनुसार, नहीं। यदि छात्र अपनी शिक्षा और अन्य दस्तावेजों के माध्यम से अपना निवास सिद्ध कर सकता है, तो माता-पिता की वोटर स्थिति एकमात्र निर्णायक कारक नहीं हो सकती।

प्रश्न 2: कोर्ट ने सर्टिफिकेट जारी करने के लिए कितना समय दिया है?
कोर्ट ने संबंधित SDO/SDM को आदेश की प्राप्ति के एक सप्ताह के भीतर सर्टिफिकेट जारी करने का निर्देश दिया है।