केरल उच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक फैसले में कहा है कि राज्य सरकार वन्यजीवों की संरक्षक है और हमले के शिकार लोगों को नुकसान की गंभीरता के आधार पर उचित मुआवजा देना उसकी कानूनी जिम्मेदारी है।

  • राज्य सरकार को वन्यजीवों का मालिक और संरक्षक माना गया है।
  • एक्स ग्रेशिया (अनुग्रह राशि) योजनाएं नागरिकों के पूर्ण मुआवजे के अधिकार को सीमित नहीं कर सकतीं।
  • फेंसिंग और खाइयों की कमी को वन अधिकारियों की लापरवाही माना गया है।

केरल उच्च न्यायालय ने मानव-वन्यजीव संघर्ष से प्रभावित नागरिकों के प्रति राज्य की जिम्मेदारी पर एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है। न्यायमूर्ति सी.पी. मोहम्मद नियास ने स्पष्ट किया कि राज्य सरकार, वन्यजीवों के संरक्षक के रूप में, पीड़ितों को उनके द्वारा झेले गए वास्तविक नुकसान के अनुरूप मुआवजा देने के लिए बाध्य है।

यह मामला स्कारिया नामक व्यक्ति की मृत्यु से जुड़ा है, जिसकी एक हाथी के हमले में मौत हो गई थी। घटना उस समय हुई जब वह एक पंचायत सड़क पर चल रहा था। पीड़ित परिवार ने वन विभाग द्वारा दिए गए ₹20,000 के मामूली मुआवजे को चुनौती दी थी। वायनाड की जिला अदालत ने परिवार को ₹1.78 लाख का मुआवजा देने का आदेश दिया था, जिसे वन विभाग ने उच्च न्यायालय में चुनौती दी थी।

यह क्यों महत्वपूर्ण है?

BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि यह निर्णय भारत में मानव-वन्यजीव संघर्ष के कानूनी परिदृश्य को मौलिक रूप से बदल देता है। 'एक्स ग्रेशिया' (स्वैच्छिक भुगतान) और 'कानूनी दायित्व' के बीच अंतर करके, अदालत ने यह सुनिश्चित किया है कि सरकारी विभाग 1980 के पुराने नियमों की आड़ में उचित मुआवजे से बच नहीं सकते।

अनुग्रह राशि मॉडल से दायित्व-आधारित मुआवजा मॉडल की ओर बढ़ना जीवन और सुरक्षा के संवैधानिक अधिकार को मजबूत करता है।

वन विभाग ने तर्क दिया था कि मृतक नशे की हालत में था और यह उसकी अपनी लापरवाही थी। विभाग ने केरल वन्यजीव हमला मुआवजा नियम, 1980 का हवाला दिया, जिसमें मुआवजे की राशि ₹20,000 तय थी। हालांकि, उच्च न्यायालय ने इन तर्कों को खारिज कर दिया और कहा कि अधिकारियों ने वन सीमाओं पर पावर फेंसिंग और खाइयां बनाने जैसे आवश्यक सुरक्षा उपाय नहीं किए थे।

ऐतिहासिक रूप से, राज्य ने वन्यजीव मुआवजे को एक कल्याणकारी उपाय के रूप में देखा है, न कि कानूनी दायित्व के रूप में। यह फैसला इस धारणा को बदलता है और अधिकारियों पर यह साबित करने का बोझ डालता है कि उन्होंने जानवरों को मानव बस्तियों में आने से रोकने के लिए हर संभव सावधानी बरती थी।

क्या आप जानते हैं?: केरल में भारत के सबसे घने जंगली हाथियों की आबादी है, जिसके कारण वायनाड और इडुक्की जैसे जिलों में अक्सर मानव-हाथी संघर्ष होता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न 1: क्या सरकार अभी भी मुआवजे को ₹20,000 तक सीमित कर सकती है?
नहीं, उच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया कि 1980 के नियम केवल एक अनुग्रह योजना हैं और यह पीड़ितों के लिए एकमात्र कानूनी उपाय नहीं हैं।

प्रश्न 2: वन विभाग की लापरवाही का क्या अर्थ है?
वन सीमाओं पर पावर फेंसिंग या खाइयां न लगाना, जिससे जानवर निजी या सार्वजनिक सड़कों पर आ सकें, लापरवाही माना जाता है।