सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव परिणामों में मतदाता गोपनीयता सुनिश्चित करने के लिए EVM में 'टोटलाइज़र' तकनीक के उपयोग पर केंद्र सरकार की राय मांगी है। यह कदम बूथ-वार गिनती के बजाय क्लस्टर-आधारित गिनती की संभावना तलाशने के लिए उठाया गया है।

  • सुप्रीम कोर्ट ने मतदाता गोपनीयता और हिंसा रोकने के लिए 'टोटलाइज़र' के उपयोग पर विचार किया।
  • सीजेआई सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने 'चुनाव संचालन नियम 1961' में संशोधन की संभावना तलाशी।
  • टोटलाइज़र तकनीक 14 पोलिंग बूथों के वोटों को एक साथ गिनने की अनुमति देती है।
  • चुनाव आयोग ने बताया कि राजनीतिक दलों का इस पर विरोध है।

नई दिल्ली: भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने मंगलवार को एक महत्वपूर्ण सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार से 'टोटलाइज़र' (Totaliser) तकनीक के उपयोग पर उनके विचार मांगे हैं। इस तकनीक का उद्देश्य EVM (इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन) में दर्ज वोटों की गिनती को क्लस्टर (समूह) में करना है, ताकि मतदाता की गोपनीयता बनी रहे और चुनाव के बाद होने वाली हिंसा को रोका जा सके।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन न्यायाधीशों की पीठ, जिसमें न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहन शामिल थे, ने यह सवाल उठाया कि क्या 'चुनाव संचालन नियम 1961' (Conduct of Elections Rules 1961) में आवश्यक बदलाव किए जा सकते हैं। वर्तमान में, यह नियम कागज के मतपत्रों की गिनती के लिए क्लस्टर पद्धति की अनुमति देता है, लेकिन EVM के लिए इसका कोई वैधानिक प्रावधान नहीं है।

क्यों महत्वपूर्ण है यह मामला?

BozokMedia विश्लेषण के अनुसार, यह मामला भारतीय लोकतंत्र की सुरक्षा और मतदाता के गुप्त मतदान के अधिकार से गहराई से जुड़ा है। वर्तमान में, बूथ-वार वोटों की गिनती से राजनीतिक दलों को पता चल जाता है कि किस विशेष बूथ पर किस पार्टी को कितना समर्थन मिला है। इससे मतदाताओं को लक्षित करने और चुनाव के बाद हिंसा भड़काने का खतरा बना रहता है।

टोटलाइज़र का उपयोग मतदाता की पहचान को सुरक्षित रखने और चुनावी हिंसा के जोखिम को कम करने के लिए एक क्रांतिकारी कदम हो सकता है।

याचिकाकर्ता के वकील अश्विनी कुमार उपाध्याय ने तर्क दिया कि टोटलाइज़र लागू करने से लोगों की जान बचाई जा सकती है। उन्होंने कहा कि अधिकांश चुनावी हिंसा इसलिए होती है क्योंकि पार्टियों को बूथ-वार आंकड़े पता होते हैं। यदि वोटों को समूहों में गिना जाएगा, तो किसी को यह पता नहीं चलेगा कि किसी विशेष बूथ पर किस पक्ष में मतदान हुआ है।

राजनीतिक विरोध और तकनीकी चुनौतियाँ

सुनवाई के दौरान, चुनाव आयोग की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता डीएस नायडू ने बताया कि इस विषय पर राजनीतिक दलों का कड़ा विरोध है। उन्होंने खुलासा किया कि एक सर्वदलीय बैठक में 50% राष्ट्रीय दलों और 68% राज्य स्तरीय दलों ने टोटलाइज़र के खिलाफ मतदान किया था।

चुनाव आयोग ने अपनी आशंकाओं को स्पष्ट करते हुए कहा कि टोटलाइज़र के उपयोग से मौजूदा ऑडिट तंत्र (Form 17C) प्रभावित हो सकता है। यदि वोटों को क्लस्टर में गिना जाता है, तो किसी एक EVM में विसंगति होने पर वह कुल योग में छिप सकती है, जिससे पारदर्शिता पर सवाल उठ सकते हैं।

विशेषतावर्तमान प्रणाली (बूथ-वार)प्रस्तावित प्रणाली (टोटलाइज़र)
गोपनीयताकम (बूथ स्तर पर डेटा उपलब्ध)उच्च (डेटा क्लस्टर में छिपा रहता है)
हिंसा का जोखिमअधिक (मतदाताओं को निशाना बनाया जा सकता है)कम (मतदाता की पहचान गुप्त रहती है)
ऑडिटिंगआसान (प्रत्येक बूथ का सटीक रिकॉर्ड)जटिल (विसंगति छिपने का डर)

न्यायमूर्ति बागची ने टिप्पणी की कि हालांकि टोटलाइज़र सिद्धांत रूप में मतदाता की पसंद को गुमनाम करने का एक उपकरण है, लेकिन इसके लिए वैधानिक समर्थन की आवश्यकता है। न्यायालय अब केंद्र सरकार के रुख का इंतजार कर रहा है कि क्या वे नियमों में बदलाव करने के इच्छुक हैं।

Frequently Asked Questions

1. टोटलाइज़र तकनीक क्या है?
टोटलाइज़र एक ऐसी प्रक्रिया या उपकरण है जो लगभग 14 पोलिंग बूथों के वोटों को एक साथ जोड़कर गिनने की अनुमति देता है, जिससे व्यक्तिगत बूथ के आंकड़े सार्वजनिक नहीं होते।

2. इसका उपयोग क्यों किया जाना चाहिए?
इसका मुख्य उद्देश्य मतदाता की गोपनीयता बनाए रखना और चुनाव के बाद बूथ-वार डेटा के आधार पर होने वाली हिंसा को रोकना है।

Did You Know?: चुनाव संचालन नियम 1961 पहले से ही कागज के मतपत्रों के लिए क्लस्टर गिनती की अनुमति देते हैं, लेकिन EVM के लिए इसे अपडेट करने की आवश्यकता है।