सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 142 की विशेष शक्तियों का उपयोग करते हुए NEET-UG 2026 मामले में प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज FIR को रद्द कर दिया है। जानिए क्या है यह शक्ति और इसकी सीमाएं क्या हैं।

  • सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 142 के तहत NEET प्रदर्शनकारियों के खिलाफ FIR रद्द करने का ऐतिहासिक आदेश दिया।
  • अनुच्छेद 142 का उद्देश्य 'पूर्ण न्याय' (Complete Justice) सुनिश्चित करना है।
  • यह शक्ति व्यापक है लेकिन संविधान और मौलिक अधिकारों के विरुद्ध नहीं हो सकती।

नई दिल्ली: उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को एक असाधारण कदम उठाते हुए, NEET-UG 2026 प्रश्नपत्र लीक मामले से जुड़े Cockroach Janta Party (CJP) से संबंधित प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामलों को रद्द कर दिया। मुख्य न्यायाधीश Surya Kant की अध्यक्षता वाली तीन न्यायाधीशों की पीठ ने अनुच्छेद 142 के तहत अपनी पूर्ण शक्तियों का प्रयोग करते हुए निर्देश दिया कि इन FIR की जांच नहीं की जाएगी और इन्हें सभी उद्देश्यों के लिए बंद कर दिया जाएगा।

अनुच्छेद 142 क्या है?

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 142 उच्चतम न्यायालय को यह शक्ति देता है कि वह किसी भी लंबित मामले में 'पूर्ण न्याय' करने के लिए आवश्यक कोई भी डिक्री या आदेश पारित कर सके। यह आदेश पूरे भारत में लागू करने योग्य होता है। यह शक्ति न्यायालय को उन कानूनी खामियों को दूर करने की अनुमति देती है जहाँ सामान्य कानून न्याय प्रदान करने में असमर्थ हो सकते हैं।

यह शक्ति कितनी व्यापक है?

न्यायिक इतिहास के माध्यम से इस शक्ति का विस्तार देखा जा सकता है। 1963 के Prem Chand Garg v. Excise Commissioner मामले में, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह शक्ति व्यापक है लेकिन संवैधानिक प्रावधानों के विरुद्ध नहीं हो सकती। वहीं, 1991 के Union Carbide Corporation v. Union of India मामले में न्यायालय ने माना कि सामान्य कानूनों में मौजूद सीमाएं अनुच्छेद 142 की संवैधानिक शक्ति को नहीं रोक सकतीं।

BozokMedia विश्लेषण: क्यों महत्वपूर्ण है यह निर्णय?

BozokMedia विश्लेषण के अनुसार, यह निर्णय न्यायपालिका की उस भूमिका को रेखांकित करता है जहाँ वह केवल कानून की व्याख्या ही नहीं करती, बल्कि सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने के लिए कानून के अंतराल को भी भरती है। यह विशेष रूप से युवा प्रदर्शनकारियों के मामले में महत्वपूर्ण है जहाँ कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग होने की संभावना थी।

अनुच्छेद 142 न्यायालय का एक ऐसा 'सुधारात्मक उपकरण' है जो कानून की कठोरता और न्याय की आवश्यकता के बीच संतुलन बनाता है।

2023 के Shilpa Sailesh v. Varun Sreenivasan मामले में, न्यायालय ने स्पष्ट किया कि वह प्रक्रियात्मक और मौलिक कानून से भी हटकर निर्णय ले सकता है, बशर्ते वह सार्वजनिक नीति के अनुकूल हो।

अनुच्छेद 142 की सीमाएं

शक्ति के साथ जिम्मेदारी भी आती है। 1998 के Supreme Court Bar Association v. Union of India मामले में कोर्ट ने कहा था कि अनुच्छेद 142 'पूरक' (supplementary) है, यह 'प्रतिस्थापन' (supplant) नहीं कर सकता। यानी, यह कानून में सुधार कर सकता है लेकिन कानून को पूरी तरह खत्म या बदल नहीं सकता।

विशेषतासामान्य कानूनी शक्तिअनुच्छेद 142 की शक्ति
उद्देश्यकानून का पालन करनापूर्ण न्याय सुनिश्चित करना
प्रकृतिसांविधिक/सीमितपूरक और अवशिष्ट (Residual)
सीमाकानून द्वारा निर्धारितसंविधान के अधीन
Did You Know?: अनुच्छेद 142 को अक्सर 'सुधारात्मक शक्ति' कहा जाता है क्योंकि यह न्याय की प्रक्रिया में आने वाली बाधाओं को दूर करने के लिए उपयोग की जाती है।

Frequently Asked Questions

1. क्या अनुच्छेद 142 का उपयोग किसी के मौलिक अधिकारों को छीनने के लिए किया जा सकता है?
नहीं, सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि यह शक्ति मौलिक अधिकारों के विरुद्ध उपयोग नहीं की जा सकती।

2. क्या यह शक्ति केवल आपराधिक मामलों में लागू होती है?
नहीं, इसका उपयोग दीवानी (Civil) और अन्य सभी कानूनी मामलों में पूर्ण न्याय के लिए किया जा सकता है।