दिल्ली उच्च न्यायालय ने भारतीय स्टेट बैंक के एक कर्मचारी की उस याचिका को खारिज कर दिया है जिसमें उन्होंने 35 वर्षों की सेवा के बावजूद पदोन्नति न मिलने पर बैंक की प्रक्रिया को चुनौती दी थी।
- दिल्ली उच्च न्यायालय ने एसबीआई कर्मचारी की पदोन्नति संबंधी अपील को खारिज किया।
- अदालत ने कहा कि प्रक्रिया में भाग लेने के बाद उसे केवल असफलता के आधार पर चुनौती नहीं दी जा सकती।
- कोर्ट ने 'दुर्भावना' (Mala fide) के आरोपों को साबित करने में कर्मचारी की विफलता को रेखांकित किया।
दिल्ली उच्च न्यायालय ने भारतीय स्टेट बैंक (SBI) के एक 63 वर्षीय कर्मचारी, श्रवण कुमार विग्मल, की उस याचिका को खारिज कर दिया है जिसमें उन्होंने अपनी पदोन्नति न दिए जाने को चुनौती दी थी। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि कोई कर्मचारी चयन प्रक्रिया में भाग लेता है, तो वह केवल इसलिए पूरी प्रक्रिया पर सवाल नहीं उठा सकता क्योंकि वह सफल नहीं हो पाया।
मामले की पृष्ठभूमि
श्रवण कुमार विग्मल ने 1983 में एसबीआई में एक क्लर्क-कम-टाइपिस्ट के रूप में अपनी सेवा शुरू की थी। उन्होंने बैंक में 35 वर्षों से अधिक का बेदाग कार्यकाल पूरा किया था। विवाद तब शुरू हुआ जब 2017 में उन्हें मिडिल मैनेजमेंट ग्रेड स्केल II से अगले स्तर पर पदोन्नति नहीं दी गई। इसके बाद उन्होंने कानूनी रास्ता अपनाया, जिसके परिणामस्वरूप जनवरी 2018 में अदालत ने बैंक को उन्हें 2018-19 की पदोन्नति प्रक्रिया में विचार करने का निर्देश दिया था।
विग्मल का तर्क था कि बैंक ने उनके साथ पक्षपात किया और पदोन्नति प्रक्रिया में 'दुर्भावना' (Mala fide) शामिल थी। उन्होंने यह भी दावा किया कि हालांकि 2017-18 के लिए कोई लिखित परीक्षा नहीं ली गई थी, लेकिन उन्हें 2018-19 की प्रक्रिया के दौरान लिखित परीक्षा देने के लिए मजबूर किया गया, जो अनुचित था।
न्यायालय का निर्णय और तर्क
मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया की पीठ ने पाया कि विग्मल यह साबित करने में विफल रहे कि बैंक ने उनके प्रति कोई द्वेषपूर्ण इरादा रखा था। अदालत ने अपने फैसले में कहा, "दुर्भावना का आरोप लगाना आसान है, लेकिन उसे साबित करना कठिन है।"
न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि विग्मल ने स्वयं पदोन्नति प्रक्रिया के तहत लिखित परीक्षा और साक्षात्कार में भाग लिया था। एक बार जब उम्मीदवार प्रक्रिया का हिस्सा बन जाता है, तो वह परिणामों से असंतुष्ट होने पर पूरी प्रक्रिया की वैधता पर संदेह नहीं कर सकता। अदालत ने उनके इस तर्क को भी खारिज कर दिया कि उनके अंक साझा नहीं किए गए थे, इसे प्रक्रिया में अनियमितता का आधार नहीं माना जा सकता।
Why This Matters
BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि यह निर्णय सरकारी और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSUs) में पदोन्नति प्रक्रियाओं की स्वायत्तता को मजबूत करता है। यह स्पष्ट करता है कि न्यायिक हस्तक्षेप केवल तभी संभव है जब प्रक्रिया में वास्तविक विसंगतियां या दुर्भावनापूर्ण इरादे साबित हों, न कि केवल व्यक्तिगत असंतोष के आधार पर।
कानूनी सिद्धांत यह है कि प्रक्रिया में भाग लेना उसकी निष्पक्षता को स्वीकार करने के समान है; असफलता के बाद प्रक्रिया को चुनौती देना न्यायिक समय की बर्बादी है।
Frequently Asked Questions
1. क्या कर्मचारी पदोन्नति प्रक्रिया में भाग लेने के बाद उसे चुनौती दे सकता है?
नहीं, न्यायालय के अनुसार, यदि आपने प्रक्रिया का हिस्सा बनकर परीक्षा दी है, तो आप केवल असफलता के आधार पर उसे चुनौती नहीं दे सकते।
2. अदालत ने विग्मल के दावों को क्यों खारिज किया?
क्योंकि वह बैंक की कार्यप्रणाली में किसी भी प्रकार की दुर्भावना या गलत इरादे को साबित करने में विफल रहे।