सुप्रीम कोर्ट ने 'पूर्ण न्याय' करने की अपनी विशेष शक्ति का उपयोग करते हुए NEET-UG पेपर लीक के विरोध में प्रदर्शन कर रहे छात्रों के खिलाफ दर्ज FIR को रद्द कर दिया है। यह वही शक्ति है जिसका उपयोग अयोध्या मामले में मस्जिद के लिए जमीन आवंटित करने हेतु किया गया था।
- सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 142 के तहत CJP आंदोलन के प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज FIR को रद्द करने का आदेश दिया।
- अदालत ने कहा कि इन मामलों की अब आगे कोई जांच नहीं की जाएगी।
- अनुच्छेद 142 का उपयोग पूर्व में अयोध्या मामले में मस्जिद के लिए जमीन देने हेतु भी किया गया था।
- यह राहत केवल सामान्य प्रदर्शनकारियों के लिए है; गंभीर अपराधियों पर कार्रवाई जारी रहेगी।
भारत के सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक ऐतिहासिक निर्णय लेते हुए संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष और अनन्य शक्तियों का प्रयोग किया। न्यायालय ने कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेतृत्व में हुए NEET-UG 2026 प्रश्नपत्र लीक के विरोध प्रदर्शनों में शामिल छात्रों और युवाओं के खिलाफ दर्ज की गई प्राथमिकी (FIR) को रद्द करने का आदेश दिया। मुख्य न्यायाधीश सूर्याकांत की अध्यक्षता वाली तीन न्यायाधीशों की पीठ ने स्पष्ट किया कि इन FIR की अब कोई जांच नहीं की जाएगी और इन्हें सभी उद्देश्यों के लिए बंद कर दिया जाएगा।
यह विवाद जुलाई के अंत में तब शुरू हुआ जब NEET-UG पेपर लीक की खबरों के बाद देशभर में भारी आक्रोश फैल गया। दिल्ली के जंतर-मंतर पर CJP के नेतृत्व में हुए प्रदर्शनों के दौरान हिंसा की खबरें भी आईं, जिसमें 200 से अधिक पुलिसकर्मी घायल हुए थे। इसके बाद दिल्ली पुलिस और विभिन्न राज्य सरकारों ने कई प्रदर्शनकारियों के खिलाफ मामले दर्ज किए थे।
Why This Matters
BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि अनुच्छेद 142 का उपयोग केवल कानूनी सुधार नहीं, बल्कि सामाजिक स्थिरता बनाए रखने का एक उपकरण है। जब कानून की सामान्य प्रक्रियाएं किसी अन्यायपूर्ण स्थिति या छात्रों के भविष्य को अंधकारमय बनाने की स्थिति में हों, तो सुप्रीम कोर्ट इस 'असाधारण शक्ति' का उपयोग करके 'पूर्ण न्याय' सुनिश्चित करता है। यह निर्णय सरकार और प्रदर्शनकारियों के बीच चल रहे लंबे गतिरोध को समाप्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
"अनुच्छेद 142 केवल एक कानूनी प्रावधान नहीं है, बल्कि यह न्यायपालिका को वह शक्ति देता है जिससे वह कानून की कमियों को भरकर वास्तविक न्याय कर सके।"
अनुच्छेद 142 के महत्व को समझने के लिए 2019 के अयोध्या मामले को देखना आवश्यक है। उस समय, सुप्रीम कोर्ट ने विवादित भूमि राम लला को सौंपने के साथ-साथ, अनुच्छेद 142 का उपयोग करते हुए केंद्र या उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश दिया था कि वे मुस्लिम पक्ष को मस्जिद निर्माण के लिए अयोध्या में ही पांच एकड़ जमीन आवंटित करें। अदालत का तर्क था कि 1949 में मस्जिद से बेदखली एक अन्याय था जिसे सुधारा जाना आवश्यक है।
हालाँकि, यह राहत सभी के लिए नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया कि 2,873 ऐसे व्यक्तियों की जांच कानून प्रवर्तन अधिकारियों द्वारा अलग से की जा सकती है, जिनका पुराना आपराधिक रिकॉर्ड है या जिनके प्रदर्शन के दौरान हिंसा में शामिल होने का संदेह है।
Frequently Asked Questions
1. अनुच्छेद 142 क्या है?
यह संविधान का एक विशेष अनुच्छेद है जो सुप्रीम कोर्ट को किसी भी मामले में 'पूर्ण न्याय' करने के लिए आवश्यक आदेश या डिक्री पारित करने की अनन्य शक्ति देता है।
2. क्या यह शक्ति असीमित है?
नहीं, यह शक्ति संविधान के दायरे और न्याय के सिद्धांतों के भीतर ही कार्य करती है, हालांकि यह कानून की सामान्य प्रक्रियाओं से ऊपर उठकर काम कर सकती है।