सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात में शराब की बोतलों के साथ जब्त किए गए एक ट्रक को 20 महीने बाद मालिक को सौंपने का आदेश दिया है। अदालत ने कहा कि वाहनों को लंबे समय तक पुलिस हिरासत में रखने से मालिकों को भारी आर्थिक नुकसान होता है।

  • सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात निषेध अधिनियम के तहत जब्त वाहन की अंतरिम कस्टडी का आदेश दिया।
  • अदालत ने कहा कि वाहनों को पुलिस परिसर में 'लंगड़ाने और खराब होने' देने से किसी का भला नहीं होता।
  • ट्रक मालिक को 15 लाख रुपये की सुरक्षा राशि और व्यक्तिगत बॉन्ड जमा करने का निर्देश दिया गया है।

नई दिल्ली/वडोदरा: भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक निर्णय सुनाते हुए कहा है कि आपराधिक मामले के लंबित रहने के दौरान जब्त किए गए वाणिज्यिक वाहनों को पुलिस या अदालत के परिसरों में वर्षों तक बेकार खड़ा रहने के लिए नहीं छोड़ा जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि इससे वाहन के मालिकों को भारी आर्थिक नुकसान होता है और वाहन की स्थिति भी खराब हो जाती है।

यह मामला जनवरी 2025 का है, जब गुजरात के लुनवाड़ा के पास एक अशोक लेलैंड ट्रक को रोका गया था। पुलिस ने आरोप लगाया कि ट्रक में 8,064 अवैध शराब की बोतलें छिपाई गई थीं। इस मामले में गुजरात उच्च न्यायालय और निचली अदालतों ने ट्रक को मालिक को सौंपने से इनकार कर दिया था, जिसे अब सुप्रीम कोर्ट ने पलट दिया है।

मामले की पृष्ठभूमि

मामला तब शुरू हुआ जब पुलिस ने मोडासा से वडोदरा जा रहे एक ट्रक को रोका। तलाशी के दौरान, ट्रक के पिछले हिस्से में प्लास्टिक बैग और कार्टन में शराब की बड़ी खेप मिली। पुलिस के अनुसार, शराब की कुल मात्रा लगभग 22,532 लीटर थी, जिसकी कीमत 17.02 लाख रुपये आंकी गई थी। ट्रक में लगभग 98.67 लाख रुपये का अन्य सामान भी मौजूद था।

ट्रक के मालिक, M/s ABC Express ने तर्क दिया कि वाहन एक व्यावसायिक संपत्ति है और इसे लंबे समय तक जब्त रखने से उनका व्यवसाय ठप हो रहा है। उन्होंने दावा किया कि मालिक इस कथित अपराध में शामिल नहीं था और वे वाहन की सुरक्षा के लिए पर्याप्त गारंटी देने को तैयार थे।

सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख

न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति श्री चंद्रशेखर की पीठ ने सवाल किया कि वाहन को 'सस्पेंडेड एनिमेशन' (स्थिर अवस्था) में रखने से वास्तव में क्या हासिल होता है? अदालत ने कहा कि निचली अदालतों ने गुजरात निषेध अधिनियम की धारा 98(2) की बहुत संकीर्ण व्याख्या की है।

अदालत ने स्पष्ट किया कि निषेध अधिनियम की धारा 98(2) अंतरिम रिहाई पर पूर्ण रोक नहीं लगाती है, और आपराधिक अदालतें संपत्ति की कस्टडी के संबंध में उचित आदेश देने की शक्ति रखती हैं।

BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि यह निर्णय उन हजारों व्यवसायियों के लिए एक बड़ी राहत है जिनके वाहन कानूनी प्रक्रियाओं के कारण पुलिस थानों में सड़ रहे हैं। अदालत ने सुझाव दिया कि साक्ष्यों को सुरक्षित रखने के लिए विस्तृत पंचनामा, फोटो और वीडियो का उपयोग किया जा सकता है, बजाय इसके कि भौतिक वाहन को अनिश्चित काल तक रखा जाए।

Why This Matters

यह निर्णय कानून के कार्यान्वयन और संपत्ति के अधिकार के बीच संतुलन बनाता है। यह सुनिश्चित करता है कि कानूनी प्रक्रिया का उपयोग अनजाने में संपत्ति के विनाश का कारण न बने।

Did You Know?: भारत में, जब्त किए गए वाहनों के रखरखाव और उनके मूल्य में गिरावट के कारण सरकार और मालिकों दोनों को हर साल करोड़ों का नुकसान होता है।

Frequently Asked Questions

1. क्या सुप्रीम कोर्ट ने ट्रक को पूरी तरह से मुक्त कर दिया है?
नहीं, अदालत ने इसे 'अंतरिम कस्टडी' में छोड़ा है। मालिक को इसे मुकदमे के दौरान पेश करना होगा और इसे बेच नहीं सकते।

2. अदालत ने रिहाई के लिए क्या शर्तें रखी हैं?
मालिक को 15 लाख रुपये की सुरक्षा और एक व्यक्तिगत बॉन्ड जमा करना होगा।