दिल्ली के एक उपभोक्ता आयोग ने अस्पताल को एक महिला को 1 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया है, क्योंकि अस्पताल वार्ड में सीसीटीवी फुटेज उपलब्ध नहीं करा सका जहाँ उसकी माँ की मृत्यु हुई थी।

  • उपभोक्ता आयोग ने अस्पताल द्वारा सीसीटीवी फुटेज न देने को 'सेवा में कमी' माना।
  • अस्पताल को मानसिक उत्पीड़न के लिए ₹1 लाख का मुआवजा देने का आदेश दिया गया।
  • आयोग ने मृत्यु के मात्र 6 मिनट के भीतर मृत्यु सारांश तैयार करने पर सवाल उठाए।

नई दिल्ली: दिल्ली के एक उपभोक्ता आयोग ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए एक अस्पताल को आदेश दिया है कि वह एक महिला को ₹1 लाख का मुआवजा प्रदान करे। यह मामला उस समय शुरू हुआ जब अस्पताल अपनी वार्ड में सीसीटीवी फुटेज देने में विफल रहा, जहाँ महिला की माँ की मृत्यु हुई थी। आयोग ने स्पष्ट किया कि मरीज के अंतिम क्षणों की फुटेज की मांग करना एक अनुचित अनुरोध नहीं है।

मामले की पृष्ठभूमि

लाक्समी नगर की एक निवासी ने 2023 में अपनी 74 वर्षीय माँ, शांता, की मृत्यु के बाद यह शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायतकर्ता का आरोप था कि उसकी माँ का इलाज के दौरान निधन हो गया और जब उसने सीसीटीवी फुटेज मांगी, तो अस्पताल ने गोपनीयता का हवाला देते हुए मना कर दिया। अस्पताल का तर्क था कि सीसीटीवी केवल प्रवेश द्वार और लॉबी में लगे हैं, वार्डों के अंदर नहीं।

आयोग की कड़ी टिप्पणी

आयोग के अध्यक्ष सुखवीर सिंह मल्होत्रा और सदस्य रवि कुमार ने अस्पताल की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने विशेष रूप से इस बात पर आश्चर्य जताया कि मरीज की मृत्यु के मात्र 6 मिनट के भीतर छह पन्नों का 'डेथ समरी' (मृत्यु सारांश) कैसे तैयार और हस्ताक्षरित किया जा सकता था। आयोग ने इस गति को "रेजर ब्लेड की गति" (अत्यधिक असामान्य) करार दिया।

अस्पताल अक्सर पारदर्शिता से बचते हैं, जो परिजनों के मन में संदेह पैदा करता है, और यह वर्तमान मामले में भी देखा गया।

क्यों यह मामला महत्वपूर्ण है?

BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि यह मामला स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र में पारदर्शिता और जवाबदेही के लिए एक मिसाल है। हालांकि आयोग ने डॉक्टर के खिलाफ चिकित्सा लापरवाही (Medical Negligence) के पर्याप्त सबूत न मिलने के कारण कार्रवाई नहीं की, लेकिन अस्पताल की रिकॉर्ड प्रबंधन में विफलता को सेवा में बड़ी कमी माना गया।

अस्पताल का बचाव

अस्पताल के वकील सुजाता राव ने तर्क दिया कि मरीज की स्थिति अत्यंत गंभीर थी और कार्डियक अरेस्ट के बाद सीपीआर (CPR) दिया गया था। अस्पताल का दावा था कि उन्होंने शिकायतकर्ता को तीन बार सूचित किया था, लेकिन वह देरी से पहुंचीं।

क्या आप जानते हैं?: उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के तहत, सेवाओं में कमी या लापरवाही के लिए आप राष्ट्रीय उपभोक्ता हेल्पलाइन नंबर 1915 पर सहायता प्राप्त कर सकते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. क्या अस्पताल वार्ड के अंदर सीसीटीवी लगाना अनिवार्य है?
कानूनी रूप से पारदर्शिता बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण क्षेत्रों में निगरानी आवश्यक है, और फुटेज न होना सेवा में कमी माना जा सकता है।

2. क्या इस मामले में डॉक्टर को दोषी ठहराया गया?
नहीं, चिकित्सा विशेषज्ञ की राय और ठोस सबूतों के अभाव में आयोग ने डॉक्टर पर लापरवाही का आरोप नहीं लगाया।