बंबई हाई कोर्ट ने एक 24 वर्षीय फिजियोथेरेपिस्ट के बलात्कार और हत्या के मामले में सात साल बाद मौत की सजा को रद्द कर दिया है। अदालत ने आरोपी देबाशीष नंदलाल धारा को बरी करते हुए तुरंत रिहा करने का आदेश दिया है।
- बंबई हाई कोर्ट ने देबाशीष नंदलाल धारा की मौत की सजा रद्द कर उसे बरी कर दिया।
- यह फैसला 2019 के सत्र न्यायालय के उस फैसले को पलटता है जिसमें इसे 'दुर्लभतम से दुर्लभ' मामला माना गया था।
- बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि पूरा मामला केवल परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित था।
- पीड़िता के परिवार ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने का निर्णय लिया है।
बंबई हाई कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए एक 24 वर्षीय फिजियोथेरेपिस्ट के बलात्कार और हत्या के आरोपी की मौत की सजा को रद्द कर दिया है। यह निर्णय उस समय आया है जब सत्र न्यायालय ने सात साल पहले इस अपराध को 'अत्यधिक मानसिक विकृति' का परिणाम बताते हुए आरोपी को फांसी की सजा सुनाई थी।
न्यायमूर्ति भारती एच डांगरे और न्यायमूर्ति मंजुषा ए देशपांडे की पीठ ने देबाशीष नंदलाल धारा द्वारा दायर अपील पर यह फैसला सुनाया। पुणे की येरवडा जेल में बंद धारा को अदालत ने पूरी तरह बरी कर दिया। पीठ ने स्पष्ट किया कि 4 अक्टूबर 2019 को अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश द्वारा पारित दोषसिद्धि और मौत की सजा के आदेश को रद्द किया जाता है और अपीलकर्ता को मुक्त किया जाता है।
यह मामला दिसंबर 2016 की घटना से जुड़ा है। विले पार्ले में रहने वाली पीड़िता अपने कमरे में मृत पाई गई थी। अभियोजन पक्ष के अनुसार, पड़ोसियों ने कमरे से धुआं निकलते देखा था, और पुलिस को शव के गले में जींस लिपटी हुई मिली थी। आरोपी धारा को दो महीने बाद उसके पैतृक स्थान पश्चिम बंगाल से गिरफ्तार किया गया था।
यह मामला क्यों महत्वपूर्ण है
BozokMedia विश्लेषण के अनुसार, यह मामला दर्शाता है कि केवल परिस्थितियों और संदेह के आधार पर दी गई सजाएं ऊपरी अदालतों में टिक नहीं पातीं। हालांकि निचली अदालत ने इसे 'जघन्य' अपराध माना था, लेकिन हाई कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि मृत्युदंड जैसे गंभीर मामले में केवल संदेह पर्याप्त नहीं है, ठोस सबूत अनिवार्य हैं।
'दुर्लभतम से दुर्लभ' श्रेणी से पूर्ण बरी होना यह साबित करता है कि न्यायिक समीक्षा संभावित न्यायिक त्रुटियों को रोकने के लिए कितनी आवश्यक है।
सुनवाई के दौरान, अपीलकर्ता के वकील युग मोहित चौधरी ने तर्क दिया कि अभियोजन का पूरा मामला परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर टिका था और आरोपी को बिना किसी ठोस सबूत के केवल संदेह के आधार पर फंसाया गया था। वहीं, अतिरिक्त लोक अभियोजक तनवीर खान ने निचली अदालत के फैसले को सही ठहराने की कोशिश की।
पीड़िता के पिता के वकील सिद्धार्थ जगुште ने इस फैसले पर असंतोष व्यक्त किया है और कहा है कि वे इस फैसले को भारत के सर्वोच्च न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) में चुनौती देंगे।
| पहलू | सत्र न्यायालय (2019) | हाई कोर्ट (2026) |
|---|---|---|
| फैसला | दोषी | बरी |
| सजा | मृत्युदंड (फांसी) | रिहाई |
| साक्ष्यों का विश्लेषण | जघन्य अपराध | अपर्याप्त/परिस्थितिजन्य साक्ष्य |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: मौत की सजा क्यों रद्द की गई?
हाई कोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष का मामला ठोस सबूतों के बजाय केवल परिस्थितियों और संदेह पर आधारित था, जो दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त नहीं था।
प्रश्न 2: अब इस मामले में आगे क्या होगा?
पीड़िता का परिवार इस बरी किए जाने के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील करेगा।