हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने एक महिला की मासिक भरण-पोषण की मांग को ठुकरा दिया है, जिसने घरेलू हिंसा का आरोप लगाया था। अदालत ने पाया कि दोनों पक्ष आर्थिक रूप से समान स्तर पर हैं और महिला घरेलू हिंसा साबित करने में विफल रही।
- हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने पत्नी द्वारा मांगी गई ₹40,000 की मासिक भरण-पोषण राशि को खारिज कर दिया।
- अदालत ने पाया कि विवाह के मात्र 6 दिनों के बाद ही दोनों अलग हो गए थे।
- दोनों पति-पत्नी सहायक प्रोफेसर हैं और आर्थिक रूप से लगभग समान स्थिति में हैं।
- महिला घरेलू हिंसा के आरोपों को साबित करने में विफल रही।
हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने घरेलू हिंसा का आरोप लगाने वाली एक महिला को भरण-पोषण देने से इनकार कर दिया है। न्यायमूर्ति राकेश कैंथला ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि महिला घरेलू हिंसा के अपने दावों को स्थापित करने में विफल रही है। अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि दोनों पति-पत्नी सहायक प्रोफेसर के रूप में कार्यरत हैं और उनकी आर्थिक स्थिति लगभग समान है, जिससे यह कहना कठिन है कि महिला स्वयं का भरण-पोषण करने में असमर्थ है।
यह मामला एक पुनर् revisión याचिका से संबंधित है जिसमें महिला ने निचली अदालतों के उन आदेशों को चुनौती दी थी, जिन्होंने ₹40,000 मासिक अंतरिम भरण-पोषण की उसकी याचिका को खारिज कर दिया था। अदालत ने नोट किया कि यह जोड़ा विवाह के केवल छह दिनों के बाद ही अलग हो गया था।
मामले की पृष्ठभूमि
विवाद की शुरुआत अक्टूबर 2023 में हुई थी। पति का आरोप है कि शादी के बाद पत्नी केवल पांच दिनों तक ही ससुराल में रही और उसने शुरू से ही असामान्य व्यवहार किया। पति ने यह भी आरोप लगाया कि पत्नी ने विवाह के फोटोग्राफी में भाग लेने से भी इनकार कर दिया था। दोनों के बीच एक समझौता हुआ था जिसमें आपसी गलतफहमी के कारण अलग होने की बात कही गई थी, लेकिन उस समझौते में घरेलू हिंसा का कोई उल्लेख नहीं था।
Why This Matters
BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि यह मामला कानून के उस सिद्धांत को मजबूत करता है जहाँ भरण-पोषण के मामलों में केवल वैवाहिक स्थिति ही नहीं, बल्कि दोनों पक्षों की वित्तीय आत्मनिर्भरता और आरोपों की सत्यता को भी महत्वपूर्ण आधार माना जाता है। यह निर्णय स्पष्ट करता है कि बिना ठोस सबूत के घरेलू हिंसा के आधार पर भरण-पोषण प्राप्त करना कठिन है, विशेषकर तब जब दोनों पक्ष उच्च शिक्षित और आर्थिक रूप से स्वतंत्र हों।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि भरण-पोषण का अधिकार केवल वित्तीय अक्षमता पर आधारित होता है, न कि केवल वैवाहिक संबंधों के टूटने पर।
महिला ने आरोप लगाया था कि उसे दहेज के लिए ताना दिया जाता था और उसे रसोई तक पहुंचने से रोका जाता था। हालांकि, अदालत ने पाया कि निचली अदालतों ने सही निष्कर्ष निकाला था कि पत्नी आर्थिक रूप से स्वतंत्र है और वह स्वयं का खर्च उठाने में सक्षम है।
Frequently Asked Questions
1. अदालत ने भरण-पोषण की मांग क्यों खारिज कर दी?
क्योंकि महिला घरेलू हिंसा के आरोपों को साबित करने में विफल रही और वह आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर पाई गई।
2. इस मामले में पति और पत्नी की क्या स्थिति थी?
दोनों ही सरकारी कॉलेज में सहायक प्रोफेसर के रूप में कार्यरत थे और उनकी आय लगभग समान थी।