ओडिशा उच्च न्यायालय ने एक कॉलेज लैब अटेंडेंट के नियमितीकरण की याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार के पुराने आदेश को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने 21 साल की अनिश्चितता को 'डेमोकल्स की तलवार' करार देते हुए विभाग को तीन महीने में पुनर्विचार का निर्देश दिया है।
- ओडिशा उच्च न्यायालय ने 21 साल से संविदा पर कार्यरत कर्मचारी के नियमितीकरण की याचिका को स्वीकार किया।
- अदालत ने राज्य सरकार द्वारा 2019 में नियमितीकरण याचिका को खारिज करने के आदेश को रद्द कर दिया।
- उच्च शिक्षा विभाग को तीन महीने के भीतर कर्मचारी के दावे पर पुनर्विचार करने का निर्देश दिया गया है।
ओडिशा उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाते हुए एक कॉलेज प्रयोगशाला अटेंडेंट (Laboratory Attendant) के साथ हुए अन्याय को समाप्त किया है। संतोष कुमार पात्रा, जो शैलबाला महिला स्वायत्त कॉलेज, कटक में कार्यरत हैं, पिछले दो दशकों से अधिक समय से संविदा (Contract) पर काम कर रहे थे। न्यायालय ने इस लंबी अनिश्चितता को 'डेमोकल्स की तलवार' (Sword of Damocles) की संज्ञा दी, जो कर्मचारी के सिर पर लगातार लटकी हुई थी।
न्यायमूर्ति मुराहारी श्री रमन ने याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि किसी कर्मचारी को वर्षों तक रोजगार की अनिश्चितता में नहीं रखा जा सकता। कोर्ट ने टिप्पणी की कि उम्मीदों को दरकिनार करना और उदासीनता दिखाना शोषण का एक रूप है। यह मामला 9 अगस्त 2019 को राज्य सरकार द्वारा पात्रा की नियमितीकरण याचिका को खारिज करने के खिलाफ दायर किया गया था।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और सेवा विवरण
रिकॉर्ड्स के अनुसार, संतोष कुमार पात्रा ने 1 सितंबर 2005 को 70 रुपये प्रतिदिन के वेतन पर चपरासी के रूप में कार्य शुरू किया था। 2007 में वह अटेंडेंट बने और 2010 में संविदात्मक प्रयोगशाला अटेंडेंट के पद पर नियुक्त हुए। उन्होंने कॉलेज के प्रवेश और परीक्षा विभागों सहित विभिन्न अनुभागों में अपनी सेवाएं दीं। उनकी सेवा का रिकॉर्ड बेदाग रहा और उनके अनुबंध को बिना किसी आपत्ति के बार-बार बढ़ाया गया।
Why This Matters
BozokMedia विश्लेषण के अनुसार, यह फैसला भारत में संविदात्मक कर्मचारियों के अधिकारों के लिए एक मिसाल है। अक्सर सरकारी विभाग तकनीकी बारीकियों और आरक्षण नियमों का हवाला देकर पुराने कर्मचारियों को नियमित करने से बचते हैं। यह निर्णय स्पष्ट करता है कि यदि किसी कर्मचारी ने दशकों तक निष्कलंक सेवा दी है, तो बाद में लागू हुए नियमों का उपयोग उन्हें उनके हक से वंचित करने के लिए नहीं किया जा सकता।
"किसी कर्मचारी को केवल तकनीकी आधार पर नियमितीकरण से वंचित करना मानवाधिकारों और श्रम न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध है।"
राज्य सरकार ने तर्क दिया था कि पात्रा एक अस्थायी कार्यकर्ता थे और उनकी स्थिति अनमा चरण नायक (जिन्हें पहले नियमित किया गया था) के समान नहीं थी। सरकार ने 2013 और 2014 के आरक्षण नियमों का भी हवाला दिया। हालांकि, उच्च न्यायालय ने इन तर्कों को 'तुच्छ' (jejune grounds) बताते हुए खारिज कर दिया और कहा कि नियुक्ति के समय कॉलेज की जिम्मेदारी थी कि वह नीतियों का पालन करे।
Frequently Asked Questions
प्रश्न 1: कोर्ट ने सरकार के किस तर्क को खारिज किया?
कोर्ट ने 2013-14 के आरक्षण नियमों और तकनीकी आधार पर नियमितीकरण से इनकार करने के सरकार के तर्क को खारिज कर दिया।
प्रश्न 2: अब आगे क्या होगा?
ओडिशा उच्च शिक्षा विभाग को अब तीन महीने के भीतर संतोष कुमार पात्रा के नियमितीकरण के दावे पर फिर से विचार करना होगा।