इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक ट्रायल कोर्ट की जज को उनके 'मनमाने' व्यवहार के लिए फटकार लगाई है। कोर्ट ने पाया कि जज ने हाईकोर्ट के आदेश और पक्षों के बीच हुए समझौते की अनदेखी कर जबरन मुकदमा चलाया।
- इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट की जज को आदेशों की अवहेलना के लिए फटकारा।
- समझौता सत्यापित होने के बावजूद जज ने आरोपियों पर आरोप तय किए और मुकदमा चलाया।
- कोर्ट ने जज के आचरण को 'न्यायिक अधिकारी के लिए अनुचित' करार दिया।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में एक ट्रायल कोर्ट की जज को उनके "घोर और स्पष्ट" उल्लंघन के लिए कड़ी फटकार लगाई है। मामला तब सामने आया जब जज ने हाईकोर्ट के स्पष्ट निर्देश के बावजूद, कि मामले का फैसला समझौते के आधार पर किया जाए, आरोपियों के खिलाफ आरोप तय किए और पूरी कानूनी प्रक्रिया (ट्रायल) को आगे बढ़ाया।
न्यायमूर्ति राज बीर सिंह इस याचिका की सुनवाई कर रहे थे, जिसे दो व्यक्तियों ने दायर किया था। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि हाईकोर्ट ने 8 अगस्त, 2025 को आदेश दिया था कि ट्रायल कोर्ट समझौते के आवेदन के आधार पर मामले का निपटारा करे। इसके बावजूद, ट्रायल कोर्ट ने इस आदेश की अनदेखी की और एक पूर्ण मुकदमे की प्रक्रिया शुरू की, जिसके बाद अंततः आरोपियों को बरी कर दिया गया।
क्यों यह मामला गंभीर है
BozokMedia के विश्लेषण के अनुसार, यह घटना न्यायिक अनुशासन के गंभीर उल्लंघन को दर्शाती है। जब उच्च न्यायालय किसी मामले में स्पष्ट दिशा-निर्देश देता है, तो निचली अदालत का उन निर्देशों को नजरअंदाज करना न केवल कानूनी प्रक्रिया का अपमान है, बल्कि यह आरोपियों के मौलिक अधिकारों का भी हनन है। इस मामले में, आरोपियों को जबरन जमानत लेनी पड़ी और मुकदमे का सामना करना पड़ा, जबकि मामला समझौते के जरिए सुलझ चुका था।
"एक न्यायिक अधिकारी का प्राथमिक कर्तव्य उच्च न्यायालय के आदेशों का अक्षरशः पालन करना है; किसी भी स्तर पर मनमानी कानूनी प्रक्रिया को वैध नहीं ठहराया जा सकता।"
अदालत के रिकॉर्ड के अनुसार, 14 अगस्त 2025 को ट्रायल कोर्ट में समझौता दाखिल किया गया था और जज द्वारा इसे सत्यापित भी किया गया था। इसके बावजूद, 28 अगस्त को आरोपियों को जमानत दी गई और 29 अगस्त को आरोप तय किए गए। गवाहों के बयान दर्ज करने के बाद 20 सितंबर 2025 को आरोपियों को बरी किया गया।
जब हाईकोर्ट ने स्पष्टीकरण मांगा, तो जज ने दावा किया कि पक्षों ने समझौते पर जोर नहीं दिया। हालांकि, कोर्ट ने पाया कि यह बयान झूठा था क्योंकि ऑर्डर शीट स्पष्ट रूप से समझौते के सत्यापन की पुष्टि करती थी। जज ने यह भी तर्क दिया कि आरोपी के वकील ने अपनी फीस लेने के लिए गवाहों के बयान दर्ज कराने का अनुरोध किया था, जिसके कारण ट्रायल चलाया गया।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: हाईकोर्ट ने जज के खिलाफ क्या कार्रवाई की?
कोर्ट ने जज की माफी स्वीकार कर ली और भविष्य में सतर्क रहने की चेतावनी दी, लेकिन फिलहाल कोई कठोर दंडात्मक कार्रवाई नहीं की।
मुख्य विवाद यह था कि हाईकोर्ट के आदेश और सत्यापित समझौते के बावजूद ट्रायल कोर्ट ने जबरन मुकदमा चलाया और आरोपियों को कानूनी प्रक्रिया के अनावश्यक दौर से गुजारा।