केरल उच्च न्यायालय ने अलाप्पुझा किशोर न्याय बोर्ड के उस आदेश पर रोक लगा दी है, जिसमें साक्ष्य जुटाने के लिए कानून के उल्लंघन में शामिल बच्चों को सार्वजनिक स्थानों पर ले जाने की अनुमति दी गई थी।
- केरल हाईकोर्ट ने साक्ष्य रिकवरी के लिए CCL (Children in Conflict with Law) की आवाजाही पर रोक लगाई।
- याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि किशोर न्याय अधिनियम, 2015 में 'एस्कॉर्टेड मूवमेंट' का कोई प्रावधान नहीं है।
- अदालत ने राज्य सरकार से इस मामले पर जवाब मांगा है।
केरल उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप करते हुए अलाप्पुझा के किशोर न्याय बोर्ड (JJB) के उस आदेश पर रोक लगा दी है, जिसमें पुलिस को एक हत्या के मामले में कानून के उल्लंघन में शामिल बच्चों (CCL) को साक्ष्य जुटाने के लिए जिले के विभिन्न सार्वजनिक स्थानों पर ले जाने की अनुमति दी गई थी। न्यायमूर्ति जी. गिरीश की एकल पीठ ने इस मामले में राज्य सरकार को जवाब देने का समय दिया है।
मामले की पृष्ठभूमि यह है कि किशोर न्याय बोर्ड ने अपराध की गंभीरता को देखते हुए पुलिस की इस मांग को स्वीकार कर लिया था। बोर्ड ने कुछ शर्तें भी रखी थीं, जैसे कि बच्चों को ऐसी गाड़ी में ले जाया जाए जिससे उनकी पहचान उजागर न हो, मीडिया और सोशल मीडिया से उन्हें दूर रखा जाए और उनकी पूरी जिम्मेदारी विशेष किशोर पुलिस इकाई (SJPU) की हो।
यह मामला क्यों महत्वपूर्ण है?
BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि यह मामला किशोर न्याय अधिनियम (JJAct) की व्याख्या और बच्चों के अधिकारों के बीच के टकराव को दर्शाता है। जहाँ एक ओर पुलिस साक्ष्यों की रिकवरी के लिए आरोपियों की मौजूदगी चाहती है, वहीं दूसरी ओर कानून बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य और उनकी गोपनीयता को प्राथमिकता देता है। यह निर्णय यह तय करेगा कि क्या 'साक्ष्य रिकवरी' के नाम पर बच्चों को उनके ऑब्जर्वेशन होम से बाहर ले जाना कानूनी रूप से मान्य है।
किशोर न्याय कानून का मूल उद्देश्य दंड देना नहीं, बल्कि सुधार करना है; इसलिए किसी भी प्रक्रिया में बच्चे के कल्याण को सर्वोपरि रखा जाना चाहिए।
याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि दस्ताने, सोना और डिजिटल डेटा जैसे साक्ष्यों की रिकवरी के लिए बच्चों को बाहर ले जाने की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने सुझाव दिया कि CCTV विश्लेषण, स्वतंत्र गवाहों की जांच, साइबर सेल की मदद और डिजिटल फॉरेंसिक जैसे कम हस्तक्षेप वाले तरीकों से भी जांच पूरी की जा सकती है। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि क्या बच्चों को ले जाने वाले अधिकारी के पास 'बाल कल्याण पुलिस अधिकारी' (CWPO) की वैध पदवी और आवश्यक प्रशिक्षण है या नहीं।
इसके अतिरिक्त, याचिका में आरोप लगाया गया कि बोर्ड ने आवाजाही की तारीख और समय को गुप्त रखा, जो पारदर्शिता के खिलाफ है। याचिकाकर्ताओं का स्पष्ट दावा है कि किशोर न्याय बोर्ड के पास किसी CCL को पुलिस हिरासत में देने का अधिकार नहीं है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. CCL का क्या अर्थ है?
CCL का अर्थ है 'Children in Conflict with Law', यानी वे बच्चे जिन्होंने किसी कानून का उल्लंघन किया है और कानूनी प्रक्रिया का सामना कर रहे हैं।
2. हाई कोर्ट ने इस आदेश पर रोक क्यों लगाई?
क्योंकि याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि कानून में 'एस्कॉर्टेड मूवमेंट' का कोई प्रावधान नहीं है और साक्ष्य जुटाने के अन्य तकनीकी तरीके उपलब्ध हैं।