गुजरात उच्च न्यायालय ने एक व्यक्ति के खिलाफ दर्ज उस FIR को रद्द कर दिया है जिसमें महिला ने शादी का झांसा देकर यौन संबंध बनाने का आरोप लगाया था। अदालत ने स्पष्ट किया कि लंबे समय तक चलने वाले सहमतिपूर्ण संबंधों को केवल शादी के वादे के आधार पर धोखाधड़ी नहीं माना जा सकता।
- गुजरात हाईकोर्ट ने 'धोखे से यौन संबंध' के आरोप में दर्ज FIR को रद्द किया।
- अदालत ने माना कि लंबे समय तक सहमति से बने संबंध को केवल शादी के वादे का आधार नहीं माना जा सकता।
- न्यायालय ने सुप्रीम कोर्ट के पिछले फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि सहमतिपूर्ण संबंध टूटने का मतलब धोखाधड़ी नहीं है।
गुजरात उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में एक व्यक्ति के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी (FIR) को रद्द कर दिया है, जिसमें एक महिला ने आरोप लगाया था कि उसने शादी का वादा करके उसे धोखा दिया। यह मामला भारतीय न्याय संहिता के तहत 'धोखे से यौन संबंध' बनाने की धाराओं के अंतर्गत दर्ज किया गया था।
मामले के विवरण के अनुसार, शिकायतकर्ता महिला (जो केस दर्ज करते समय विधवा थी) का आरोप था कि जून 2023 से अप्रैल 2025 के बीच उसका आरोपी के साथ प्रेम संबंध था। महिला का दावा था कि आरोपी ने उससे शादी करने का वादा किया था, यहाँ तक कि मंगलसूत्र बांधने की एक रस्म भी हुई थी। हालांकि, जब व्यक्ति ने शादी करने से इनकार कर दिया, तो महिला ने पुलिस की शरण ली।
BozokMedia विश्लेषण के अनुसार, यह फैसला भारत में 'शादी के वादे पर यौन संबंध' और 'सहमति' के बीच की कानूनी रेखा को और स्पष्ट करता है। अक्सर ऐसे मामलों में आपराधिक धाराओं का उपयोग व्यक्तिगत विवादों को सुलझाने के लिए किया जाता है। अदालत का यह रुख दर्शाता है कि यदि संबंध लंबे समय तक चला है और वयस्क व्यक्तियों के बीच सहमति थी, तो केवल शादी न हो पाने को अपराध नहीं माना जा सकता।
सुनवाई के दौरान, आवेदक के वकील जिग्नेशकुमार नायक ने तर्क दिया कि यह पूरी तरह से सहमतिपूर्ण संबंध था और FIR केवल इसलिए दर्ज की गई क्योंकि शादी नहीं हो सकी। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि "एक खराब हो चुके रिश्ते का मतलब यह नहीं है कि वह धोखाधड़ी से किया गया यौन संबंध था।"
"जब एक महिला लंबे समय तक जानबूझकर शारीरिक संबंध बनाए रखती है, तो यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि वह संबंध केवल शादी के वादे के कारण था।"
दूसरी ओर, राज्य सरकार और शिकायतकर्ता के वकीलों ने तर्क दिया कि आरोपी पहले से शादीशुदा था, इसलिए वह जानता था कि वह महिला से शादी नहीं कर सकता। उन्होंने इसे धोखाधड़ी करार दिया। हालांकि, जस्टिस एमआर मेंगडे ने पाया कि FIR में खुद महिला ने स्वीकार किया था कि उनके बीच प्रेम संबंध थे और उन्होंने कई गेस्ट हाउस में साथ समय बिताया था।
अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि यदि संबंध कई वर्षों तक चलता है, तो यह कहना तर्कहीन है कि महिला की सहमति केवल शादी के भ्रम (misconception of fact) के कारण थी। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने FIR और उससे जुड़ी सभी कानूनी कार्यवाहियों को रद्द कर दिया।
1. क्या शादी का वादा करके संबंध बनाना हमेशा अपराध है?
नहीं, यदि संबंध वयस्क व्यक्तियों के बीच सहमति से और लंबे समय तक चला है, तो इसे हमेशा धोखाधड़ी नहीं माना जाता, जब तक कि यह साबित न हो कि शुरुआत से ही इरादा धोखा देने का था।
क्योंकि सबूतों और FIR से पता चला कि यह एक लंबे समय तक चलने वाला सहमतिपूर्ण प्रेम संबंध था, जिसे केवल शादी न होने के कारण आपराधिक मामला नहीं बनाया जा सकता।