झारखंड उच्च न्यायालय ने साक्ष्यों के अभाव में एक व्यक्ति की बलात्कार के प्रयास की सजा को संशोधित कर 'महिला की लज्जा भंग करने' के अपराध में बदल दिया है। यह फैसला घटना के 26 साल बाद आया है।
- झारखंड उच्च न्यायालय ने बलात्कार के प्रयास (धारा 376/511) की सजा को धारा 354 (लज्जा भंग करना) में बदला।
- अदालत ने पाया कि बलात्कार के प्रयास के लिए पर्याप्त 'निकटतम साक्ष्य' मौजूद नहीं थे।
- दोषी व्यक्ति को पहले से काटी गई 8 महीने की जेल की अवधि को ही अंतिम सजा माना गया।
रांची: झारखंड उच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक और कानूनी रूप से जटिल मामले में फैसला सुनाते हुए एक व्यक्ति की सजा को संशोधित किया है। न्यायमूर्ति प्रदीप कुमार श्रीवास्तव द्वारा 31 अगस्त, 2026 को दिए गए इस निर्णय में अदालत ने स्पष्ट किया कि आरोपी के कृत्य से महिला की लज्जा भंग करने का प्रयास तो सिद्ध होता है, लेकिन इसे बलात्कार का प्रयास नहीं माना जा सकता।
यह पूरा मामला दिसंबर 1999 का है, जब पीड़ित महिला ने आरोप लगाया था कि कमलेंदु महतो ने जबरन उसके घर में प्रवेश किया और उसके साथ बलात्कार का प्रयास किया। महिला द्वारा शोर मचाने और विरोध करने पर आरोपी वहां से फरार हो गया था। इस घटना के बाद निचली अदालत (घाटशिला, पूर्वी सिंहभूम) ने 2006 में महतो को दोषी ठहराते हुए चार साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी।
क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला?
BozokMedia विश्लेषण के अनुसार, यह मामला भारतीय दंड संहिता (IPC) के तहत 'बलात्कार के प्रयास' और 'लज्जा भंग करने' के बीच के सूक्ष्म कानूनी अंतर को रेखांकित करता है। अदालत ने पाया कि प्राथमिकी (FIR) और गवाहों के बयानों में ऐसे किसी विशिष्ट कृत्य का उल्लेख नहीं था जो यौन संबंध बनाने के प्रयास के अत्यंत निकट हो।
"कानूनी रूप से, बलात्कार के प्रयास के लिए एक ऐसे कृत्य का होना आवश्यक है जो अपराध के निष्पादन के बहुत करीब हो, केवल अश्लील हमला पर्याप्त नहीं है।"
उच्च न्यायालय ने नोट किया कि हालांकि पीड़िता ने हमले का वर्णन किया था, लेकिन अन्य गवाहों ने केवल आरोपी को भागते हुए देखा था। अदालत ने कहा कि पीड़िता द्वारा परिवार को दी गई तत्काल जानकारी से यह संकेत मिलता है कि यह एक हमला और लज्जा भंग करने का प्रयास था, न कि बलात्कार का प्रयास।
अदालत ने धारा 452 (घर में जबरन घुसना) के तहत दोषसिद्धि को बरकरार रखा, लेकिन मुख्य आरोप को संशोधित कर दिया। चूंकि घटना को 26 साल बीत चुके हैं और आरोपी पहले ही 8 महीने जेल में बिता चुका है, इसलिए अदालत ने उसे उसी अवधि की सजा देकर रिहा करने का आदेश दिया।
| विवरण | निचली अदालत का फैसला (2006) | उच्च न्यायालय का फैसला (2026) |
|---|---|---|
| मुख्य धारा | धारा 376/511 (बलात्कार का प्रयास) | धारा 354 (लज्जा भंग करना) |
| सजा | 4 साल कठोर कारावास | पहले से काटी गई अवधि (8 महीने) |
| आधार | पीड़िता का बयान | साक्ष्यों की कमी और कानूनी व्याख्या |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. अदालत ने सजा क्यों बदली?
अदालत ने पाया कि मामले में ऐसे किसी ठोस सबूत का अभाव था जो यह साबित करे कि आरोपी ने वास्तव में बलात्कार करने का प्रयास किया था, बल्कि यह केवल एक अश्लील हमला था।
2. आरोपी को अब कितनी सजा मिली?
अदालत ने उसे पहले से काट चुके 8 महीने के कारावास की अवधि को ही उसकी अंतिम सजा माना।