सुप्रीम कोर्ट ने एक UAPA आरोपी को उसकी बीमार मां और सुनने में अक्षम बच्चे की देखभाल के लिए 10 दिनों की अंतरिम जमानत दी है। अदालत ने आरोपी की लगभग 6 साल की लंबी कैद और ट्रायल में हो रही देरी को आधार बनाया।
- सुप्रीम कोर्ट ने UAPA आरोपी को 10 दिनों की अंतरिम जमानत प्रदान की।
- अदालत ने 5 साल और 11 महीने की लंबी कैद और लंबित ट्रायल को ध्यान में रखा।
- जमानत का मुख्य आधार बीमार मां और बच्चे की सर्जरी की आवश्यकता है।
- UAPA की धारा 43D(5) और अनुच्छेद 21 के बीच कानूनी संघर्ष जारी है।
नई दिल्ली: भारत के उच्चतम न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए एक ऐसे व्यक्ति को अंतरिम जमानत दी है, जो पिछले लगभग छह वर्षों से गैर-कानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के तहत विचाराधीन कैदी के रूप में जेल में बंद है। जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस ए.जी. मसीह की पीठ ने आरोपी को उसकी बीमार मां और सुनने में अक्षम बच्चे की देखभाल करने की अनुमति दी है।
अदालत ने यह आदेश देते हुए स्पष्ट किया कि जमानत की अवधि केवल 10 दिनों (11 सितंबर से 21 सितंबर 2026) के लिए होगी, जिसके बाद आरोपी को पुनः आत्मसमर्पण करना होगा। याचिकाकर्ता के वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ दवे और अधिवक्ता नेहा राठी ने तर्क दिया कि उनके मुवक्किल पिछले 5 साल और 11 महीने से जेल में हैं, जबकि कुल 50 गवाहों में से केवल 20 की ही जांच हो सकी है।
Why This Matters
BozokMedia विश्लेषण के अनुसार, यह मामला केवल एक व्यक्ति की जमानत का नहीं है, बल्कि यह UAPA जैसे कठोर कानूनों के तहत 'व्यक्तिगत स्वतंत्रता' और 'राज्य की सुरक्षा' के बीच के संतुलन को दर्शाता है। जब ट्रायल में अत्यधिक देरी होती है, तो यह संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन बन जाता है।
राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने इस जमानत का कड़ा विरोध किया था। NIA का तर्क था कि बच्चे की विकलांगता पुरानी है और मां को किसी तत्काल चिकित्सा उपचार की आवश्यकता नहीं है। हालांकि, न्यायालय ने पाया कि बच्चे को 'बाइलेटरल कॉक्लियर इम्प्लांटेशन' सर्जरी की आवश्यकता है और याचिकाकर्ता के भाई को भी आंखों की सर्जरी करानी है।
"संवैधानिक अदालतें UAPA की वैधानिक सीमाओं के सामने मूक दर्शक नहीं बन सकतीं, विशेषकर जब आरोपी का मौलिक अधिकार खतरे में हो।"
ऐतिहासिक कानूनी संदर्भ
यह मामला 2021 के के.ए. नजीब मामले के फैसले पर आधारित है। उस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि यदि ट्रायल में अत्यधिक देरी होती है और आरोपी लंबे समय तक जेल में रहता है, तो संवैधानिक अदालतें UAPA की धारा 43D(5) के प्रतिबंधों को दरकिनार कर जमानत दे सकती हैं। इसी सिद्धांत को मई 2026 में सैयद इफ्तिखार अंदाबी बनाम भारत संघ मामले में भी दोहराया गया था।
| तर्क (NIA) | तर्क (याचिकाकर्ता/कोर्ट) |
|---|---|
| बच्चे की विकलांगता पुरानी है। | बच्चे को तत्काल सर्जरी की आवश्यकता है। |
| मां को तत्काल इलाज की जरूरत नहीं। | लंबी कैद (6 साल) मानवीय आधार पर विचारणीय है। |
| UAPA के कड़े प्रावधान लागू होने चाहिए। | अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) सर्वोपरि है। |
Frequently Asked Questions
1. UAPA क्या है?
यह एक आतंकवाद विरोधी कानून है जो भारत में गैरकानूनी गतिविधियों और आतंकवादी कृत्यों को रोकने के लिए बनाया गया है।
2. क्या लंबी कैद UAPA में जमानत का आधार बन सकती है?
हाँ, के.ए. नजीब मामले के बाद, यदि ट्रायल में अत्यधिक देरी होती है, तो सुप्रीम कोर्ट ने इसे अनुच्छेद 21 के तहत जमानत का आधार माना है।