सुप्रीम कोर्ट ने जाम्बिया स्थित एक NRI के खिलाफ दर्ज FIR को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि शादी का वादा निभाने में असमर्थ होना और शुरुआत से ही धोखा देने की नियत रखना, दो अलग बातें हैं।
- सुप्रीम कोर्ट ने BNS की धारा 69 के तहत जाम्बिया स्थित NRI के खिलाफ FIR रद्द की।
- कोर्ट ने 'नेक नीयत से किए गए वादे' और 'धोखाधड़ी की नीयत' के बीच अंतर स्पष्ट किया।
- मां की बाद में असहमति को शुरुआती नेक नीयत का प्रमाण माना गया, न कि धोखाधड़ी का।
भारतीय न्याय संहिता (BNS) की एक महत्वपूर्ण व्याख्या करते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने जाम्बिया स्थित एक अनिवासी भारतीय (NRI) को बड़ी राहत दी है। इस व्यक्ति पर वडोदरा, गुजरात में एक महिला के साथ शादी का झूठा वादा करके यौन संबंध बनाने का आरोप था। नए कानून की धारा 69 के तहत इस अपराध के लिए दस साल तक की कैद का प्रावधान है।
यह कानूनी लड़ाई तब शुरू हुई जब शिकायतकर्ता महिला ने आरोप लगाया कि उसकी मुलाकात नवंबर 2022 में फेसबुक के जरिए इस व्यक्ति से हुई थी। फरवरी 2024 में वडोदरा में पहली बार मिलने के बाद, दोनों ने एक होटल में दो दिन बिताए। महिला का आरोप था कि व्यक्ति ने दिसंबर 2024 तक शादी करने का वादा किया, लेकिन जनवरी 2025 में उसने अपनी मां की असहमति का हवाला देते हुए शादी से इनकार कर दिया।
यह मामला क्यों महत्वपूर्ण है?
BozokMedia के विश्लेषण के अनुसार, यह फैसला शादी के वादों से जुड़े कानूनी मामलों में एक महत्वपूर्ण मिसाल कायम करता है। 'वादे के टूटने' और 'धोखाधड़ी के आचरण' के बीच अंतर करके, अदालत आपसी सहमति से बने रिश्तों के अपराधीकरण को रोक रही है। इससे यह सुनिश्चित होगा कि धारा 69 का उपयोग केवल उन लोगों को दंडित करने के लिए किया जाए जो शुरुआत से ही शिकार बनाने की नीयत रखते थे।
इससे पहले गुजरात उच्च न्यायालय ने FIR को रद्द करने से इनकार कर दिया था। हाई कोर्ट का तर्क था कि व्यक्ति को रिश्ता शुरू करने से पहले अपनी मां की राय लेनी चाहिए थी और बाद में इनकार करना दुर्भावनापूर्ण इरादे को दर्शाता है। हालांकि, जस्टिस जे बी पारदीवाला और जस्टिस के विनोद चंद्रन की सुप्रीम कोर्ट बेंच ने इस दृष्टिकोण को पलट दिया।
सहमति से बने रिश्तों के विवादों में न्याय का आधार यह है कि क्या वादा धोखा देने की नीयत से किया गया था या नेक नीयत से किया गया वादा बाद में टूट गया।
सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि शिकायतकर्ता के बयानों में यह स्पष्ट नहीं था कि शारीरिक संबंध केवल शादी के वादे के आधार पर ही बनाए गए थे। अदालत ने यह भी कहा कि जिस तरह से व्यक्ति ने अपनी मां की असहमति का कारण बताया, उससे यह संकेत मिलता है कि वादा शुरू में नेक नीयत से किया गया था, न कि यह कोई सोची-समझी साजिश थी।
ऐतिहासिक रूप से, ऐसे मामले भारतीय दंड संहिता (IPC) के तहत आते थे। BNS में आने के बाद 'छलपूर्ण साधनों' (deceitful means) के संबंध में अधिक स्पष्ट भाषा का उपयोग किया गया है। कोर्ट ने जोर देकर कहा कि अपराध तभी माना जाएगा जब वादा इस इरादे से किया गया हो कि उसे कभी पूरा नहीं किया जाएगा।
| पहलू | गुजरात हाई कोर्ट का दृष्टिकोण | सुप्रीम कोर्ट का दृष्टिकोण |
|---|---|---|
| मां की असहमति | नेक नीयत का कारण नहीं; दुर्भावना दर्शाता है। | संकेत देता है कि वादा शुरू में नेक नीयत से किया गया था। |
| रिश्ते की प्रकृति | वादे को पूरा न करने पर ध्यान केंद्रित किया। | इस बात पर ध्यान दिया कि क्या वादा शुरू से ही धोखे वाला था। |
| परिणाम | FIR रद्द करने से इनकार किया। | FIR को पूरी तरह रद्द कर दिया। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: भारतीय न्याय संहिता की धारा 69 क्या है?
यह वह प्रावधान है जो शादी के झूठे वादे या धोखे से यौन संबंध बनाने पर दंड देता है, जिसमें 10 साल तक की जेल हो सकती है।
प्रश्न 2: क्या हर टूटा हुआ शादी का वादा आपराधिक मामला बनता है?
नहीं। इस फैसले के अनुसार, केवल वही वादे आपराधिक माने जाते हैं जो शुरू से ही इस नियत से किए गए हों कि उन्हें कभी पूरा नहीं किया जाएगा।