वरिष्ठ अधिवक्ता विभा दत्ता मखीजा ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा अपने ही पुराने फैसलों को पलटने की बढ़ती प्रवृत्ति पर चिंता जताई है, जिससे देश में कानूनी अनिश्चितता का माहौल बन रहा है।

  • सुप्रीम कोर्ट द्वारा 'स्टेयर डिसीसिस' (पूर्व निर्णयों का सम्मान) के सिद्धांत में निरंतर बदलाव देखा जा रहा है।
  • कानून की स्थिरता 'रूल ऑफ लॉ' का आधार है, लेकिन हालिया फैसलों ने इसे खतरे में डाला है।
  • इंदौर डेवलपमेंट अथॉरिटी जैसे मामलों ने भूमि अधिग्रहण कानूनों में भारी भ्रम पैदा किया है।
  • न्यायिक त्रुटियों को सुधारना आवश्यक है, लेकिन इसके लिए एक व्यवस्थित आंतरिक अनुशासन की जरूरत है।

भारत, दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में, एक अत्यंत जटिल कानूनी प्रणाली का संचालन करता है। संविधान के अनुच्छेद 141 के तहत, सुप्रीम कोर्ट का यह संवैधानिक कर्तव्य है कि वह 'स्टेयर डिसीसिस' (Stare Decisis) के सिद्धांत का पालन करे। इस लैटिन कानूनी सूत्र का अर्थ है—'तय की गई बातों पर अडिग रहना और स्थिर मामलों को विचलित न करना'। हालांकि, वरिष्ठ अधिवक्ता विभा दत्ता मखीजा का तर्क है कि न्यायालय अब अपने ही फैसलों में 'फ्लिप-फ्लॉप' (उलट-फेर) कर रहा है, जिससे कानूनी स्पष्टता धुंधली होती जा रही है।

कानून की निश्चितता किसी भी सभ्य समाज में 'रूल ऑफ लॉ' की नींव होती है। अरस्तू, लॉक और मोंटेस्क्यू जैसे विचारकों ने इस बात पर जोर दिया है कि कानून स्थिर और पूर्वानुमेय होने चाहिए। अमेरिकी प्राकृतिक कानून सिद्धांतकार लोन एल. फुलर ने अपनी पुस्तक 'द मोरालिटी ऑफ लॉ' (1964) में स्पष्ट किया था कि कानूनों की स्थिरता और निरंतरता न्याय प्रणाली की आंतरिक नैतिकता के लिए अनिवार्य है।

Why This Matters

BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि जब सर्वोच्च न्यायालय बिना किसी स्पष्ट और व्यापक प्रक्रिया के अपने पिछले निर्णयों को बदलता है, तो इसका सीधा असर आम नागरिकों और कॉर्पोरेट संस्थाओं पर पड़ता है। यह न केवल न्यायिक अराजकता पैदा करता है, बल्कि कानूनी सलाहकारों और निचली अदालतों के लिए भी भ्रम की स्थिति पैदा करता है कि वास्तव में वर्तमान में कौन सा कानून प्रभावी है।

इस अस्थिरता का एक ज्वलंत उदाहरण 'राइट टू फेयर कंपनसेशन एक्ट' के मामलों में देखा जा सकता है। 2013 के भूमि अधिग्रहण कानून के शुरुआती दौर में, सुप्रीम कोर्ट ने लाभार्थियों के पक्ष में व्याख्या की थी। लेकिन 2020 के इंदौर डेवलपमेंट अथॉरिटी मामले में, कोर्ट ने राज्य के अधिग्रहण अधिकारों को प्राथमिकता दी, जिससे पिछले कई वर्षों की कानूनी समझ पलट गई। विशेषज्ञों का मानना है कि यह बदलाव व्यक्तिगत न्यायिक दर्शन का परिणाम हो सकता है, जिसे अब एक बड़ी बेंच द्वारा सुधारा जाना आवश्यक है।

न्यायिक व्याख्या अनिवार्य है क्योंकि संविधान एक जैविक दस्तावेज है, लेकिन इसकी अंतिम कसौटी स्वयं संविधान होना चाहिए, न कि वह जो हमने पहले कहा था।

हालांकि, यह भी सच है कि असहमति के स्वर न्यायिक निर्णय लेने की प्रक्रिया को समृद्ध करते हैं। एडीएम जबलपुर (1976) मामले में जस्टिस एच.आर. खन्ना की असहमति इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, जिसे दशकों बाद के.एस. पुट्टास्वामी (2017) मामले में सही माना गया। यह दर्शाता है कि गलतियों को सुधारना जरूरी है, लेकिन यह प्रक्रिया मनमानी नहीं होनी चाहिए।

न्यायालय को लचीलापन चाहिए, लेकिन यह लचीलापन आंतरिक अनुशासन पर आधारित होना चाहिए। सेंट्रल बोर्ड ऑफ दाऊदी बोहरा कम्युनिटी (2004) मामले में यह नियम तय किया गया था कि यदि किसी छोटी बेंच को पिछले फैसले पर संदेह है, तो उसे सीधे बड़ी बेंच को रेफर किया जाना चाहिए, न कि स्वयं उस फैसले को पलट देना चाहिए।

क्या आप जानते हैं?: 'स्टेयर डिसीसिस' एक लैटिन शब्द है जिसका अर्थ है 'निर्णय किए गए मामलों पर टिके रहना', ताकि कानून में एकरूपता बनी रहे।

Frequently Asked Questions

1. स्टेयर डिसीसिस (Stare Decisis) क्या है?
यह एक कानूनी सिद्धांत है जिसके अनुसार अदालतों को अपने पिछले फैसलों का पालन करना चाहिए ताकि कानून में स्थिरता और पूर्वानुमेयता बनी रहे।

2. क्या सुप्रीम कोर्ट अपने पुराने फैसले बदल सकता है?
हाँ, सुप्रीम कोर्ट अपने फैसले बदल सकता है, लेकिन यह आमतौर पर तब होता है जब कोई बड़ी बेंच पिछले फैसले को गलत मानती है या समय के साथ संवैधानिक व्याख्या में बदलाव आवश्यक होता है।