बॉम्बे हाई कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार को सार्वजनिक रोजगार में 'एड-हॉकवाद' को खत्म करने और लंबी अवधि की संविदात्मक नियुक्तियों को समाप्त करने का कड़ा निर्देश दिया है। कोर्ट ने वसई विरार नगर निगम को 450 से अधिक चिकित्सा कर्मियों को नियमित करने का आदेश भी दिया है।

  • बॉम्बे हाई कोर्ट ने सरकार को सार्वजनिक रोजगार में 'एड-हॉकवाद' (तदर्थवाद) को इतिहास बनाने का निर्देश दिया।
  • वसई विरार नगर निगम (VVMC) को 450 से अधिक चिकित्सा अधिकारियों और पैरामेडिकल स्टाफ को नियमित करने का आदेश दिया गया।
  • अदालत ने संविदात्मक नियुक्तियों को केवल अपवाद और नियमित नियुक्तियों को नियम बनाने पर जोर दिया।
  • कोर्ट ने नौकरशाही की सुस्ती और स्वीकृत पदों को भरने में देरी पर सवाल उठाए।

बॉम्बे हाई कोर्ट ने शुक्रवार को महाराष्ट्र सरकार को एक अत्यंत महत्वपूर्ण निर्देश देते हुए कहा कि सार्वजनिक रोजगार में 'एड-हॉकवाद' (Ad-hocism) को अब इतिहास बना दिया जाना चाहिए। न्यायमूर्ति गिरीश एस. कुलकर्णी और न्यायमूर्ति आरती ए. साठे की खंडपीठ ने सरकार से सभी नगर निगमों को निर्देश जारी करने को कहा कि वे लंबी अवधि की संविदात्मक नियुक्तियों को समाप्त करें और पिछले सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों के अनुसार कर्मचारियों का नियमितीकरण सुनिश्चित करें।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला वसई विरार नगर निगम (VVMC) के उन चिकित्सा अधिकारियों और पैरामेडिकल कर्मचारियों से जुड़ा है जो पिछले 8 से 11 वर्षों से संविदा (Contract) के आधार पर काम कर रहे हैं। याचिकाकर्ताओं के वकीलों, अभिजीत देसाई और मोहिनी रेपडे ने तर्क दिया कि सभी पात्रता मानदंडों, साक्षात्कार और आरक्षण प्रक्रियाओं को पूरा करने के बावजूद, इन डॉक्टरों और नर्सों को बार-बार अनुबंध नवीनीकरण के झंझट से गुजरना पड़ता है।

अदालत ने जनवरी 2026 में शहरी विकास विभाग और VVMC द्वारा जारी उन संचारों को रद्द कर दिया, जिनमें संविदा कर्मचारियों के लिए फिर से लिखित परीक्षा देने की शर्त रखी गई थी। कोर्ट ने नगर निगम को दो सप्ताह के भीतर इन कर्मचारियों को नियमित करने का स्पष्ट आदेश दिया है।

Why This Matters

BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि यह निर्णय न केवल हजारों कर्मचारियों के भविष्य को सुरक्षित करेगा, बल्कि राज्य की प्रशासनिक कार्यप्रणाली में एक बड़ा सुधार भी लाएगा। संविदा प्रथा अक्सर योग्य पेशेवरों के बीच अनिश्चितता पैदा करती है, जिससे सार्वजनिक सेवाओं की गुणवत्ता प्रभावित होती है।

'संविदात्मक नियुक्तियां केवल अल्पकालिक अपवाद होनी चाहिए, न कि स्थायी कैडर के विकल्प के रूप में इस्तेमाल की जाने वाली व्यवस्था।'

न्यायमूर्ति कुलकर्णी ने टिप्पणी करते हुए कहा कि एक बड़े देश में बेरोजगारी राज्य की प्रमुख चिंताओं में से एक है। उन्होंने कहा कि नागरिकों द्वारा सार्वजनिक रोजगार के हर संभव अवसर (चाहे वह संविदात्मक हो या अस्थायी) को पकड़ना कोई गलत बात नहीं है। अदालत ने नौकरशाही की सुस्ती पर भी सवाल उठाए कि जब योग्य कार्यबल उपलब्ध है, तो नियमित नियुक्तियों के लिए स्वीकृत पदों का सृजन क्यों नहीं किया जा रहा है?

ऐतिहासिक संदर्भ

भारत में सार्वजनिक क्षेत्र में नियमितीकरण का मुद्दा दशकों पुराना है। सर्वोच्च न्यायालय ने समय-समय पर विभिन्न फैसलों में स्पष्ट किया है कि यदि कोई कर्मचारी लंबे समय तक बिना किसी अंतराल के सेवा देता है, तो उसे नियमित करने के अधिकार प्राप्त हैं, ताकि सरकार 'संविदा' शब्द का उपयोग स्थायी कर्मचारियों की जिम्मेदारी से बचने के लिए न कर सके।

Did You Know?: भारत में कई सरकारी विभागों में संविदा कर्मचारी कुल कार्यबल का एक बड़ा हिस्सा बनाते हैं, लेकिन उन्हें अक्सर समान वेतन और सामाजिक सुरक्षा के लाभों से वंचित रखा जाता है।

Frequently Asked Questions

1. बॉम्बे हाई कोर्ट ने VVMC को क्या आदेश दिया है?
कोर्ट ने VVMC को 450 से अधिक संविदात्मक चिकित्सा और पैरामेडिकल कर्मचारियों को दो सप्ताह के भीतर नियमित करने का आदेश दिया है।

2. अदालत ने सरकार को क्या मुख्य निर्देश दिया है?
अदालत ने महाराष्ट्र सरकार को सभी नगर निगमों में लंबी अवधि की संविदात्मक नियुक्तियों को समाप्त करने और एक व्यापक नियमितीकरण नीति बनाने का निर्देश दिया है।