पुणे में एक सेवानिवृत्त सेना अधिकारी को 'डिजिटल अरेस्ट' के नाम पर सुनियोजित तरीके से ठगा गया। जालसाजों ने टेलीकॉम मुख्यालय और सीबीआई अधिकारी बनकर उन्हें डराया और उनके जीवन भर की कमाई के 1.28 करोड़ रुपये हड़प लिए।

  • पुणे के एक 70 वर्षीय सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारी को डिजिटल अरेस्ट का शिकार बनाया गया।
  • जालसाजों ने टेलीकॉम मुख्यालय और सीबीआई के फर्जी अधिकारी बनकर डराया।
  • पीड़ित ने अपनी बचत और एफडी से कुल 1.28 करोड़ रुपये ट्रांसफर किए।
  • परिवार की सतर्कता के बाद मामले का खुलासा हुआ।

पुणे में साइबर अपराधियों ने एक बेहद गंभीर और सुनियोजित धोखाधड़ी को अंजाम दिया है, जिसमें 70 वर्षीय सेवानिवृत्त सेना अधिकारी को 'डिजिटल अरेस्ट' के जाल में फंसाकर 1.28 करोड़ रुपये की चपत लगाई गई। यह मामला दर्शाता है कि कैसे अपराधी मनोवैज्ञानिक दबाव का उपयोग करके वरिष्ठ नागरिकों को निशाना बना रहे हैं।

घटना की शुरुआत 20 अगस्त को हुई, जब पीड़ित को एक अज्ञात महिला का फोन आया। कॉल करने वाली महिला ने खुद को 'नई दिल्ली टेलीकॉम मुख्यालय' का अधिकारी बताया। उसने दावा किया कि पीड़ित के नाम पर पंजीकृत एक मोबाइल नंबर का उपयोग मुंबई से अश्लील सामग्री भेजने और धोखाधड़ीपूर्ण कॉल करने के लिए किया जा रहा है। इसके तुरंत बाद, पीड़ित को मुंबई क्राइम ब्रांच के एक फर्जी पुलिस अधिकारी से जोड़ दिया गया।

अपराध का तरीका: मनोवैज्ञानिक दबाव और फर्जी पहचान

धोखाधड़ी करने वालों ने पीड़ित को डराने के लिए व्हाट्सएप पर एक फर्जी एफआईआर (FIR) और कथित अश्लील सामग्री की तस्वीरें भेजीं। अपराधियों ने पीड़ित से उनके परिवार, बैंक खातों, सावधि जमा (FD) और सोने के भंडार के बारे में भी पूछताछ की। जालसाजों ने पीड़ित को बताया कि एक वरिष्ठ नागरिक होने के नाते वे उनकी 'मदद' करेंगे, लेकिन कानूनी कार्रवाई से बचने के लिए उन्हें 'डिजिटल अरेस्ट' के तहत रखा जाएगा।

वीडियो कॉल के दौरान, एक अन्य जालसाज ने पुलिस की वर्दी पहनकर खुद को सीबीआई अधिकारी 'पवार' के रूप में पेश किया। बाद में, 'विजय खन्ना' नामक एक अन्य फर्जी अधिकारी ने पीड़ित को निर्देश दिया कि वे अपनी सभी एफडी तोड़ दें और पैसा उनके बताए गए बैंक खातों में स्थानांतरित कर दें।

साइबर अपराधी अब केवल तकनीकी रूप से ही नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक रूप से भी बहुत परिष्कृत हो गए हैं, जिससे वरिष्ठ नागरिकों को बचाना चुनौतीपूर्ण हो गया है।

Why This Matters

BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि 'डिजिटल अरेस्ट' एक उभरता हुआ और बेहद खतरनाक साइबर अपराध है। इसमें अपराधी कानून प्रवर्तन एजेंसियों (पुलिस, सीबीआई, ईडी) का रूप धारण करते हैं और पीड़ित को यह विश्वास दिलाते हैं कि वे कानूनी संकट में हैं। यह न केवल वित्तीय हानि है, बल्कि पीड़ित के मानसिक स्वास्थ्य पर भी गहरा प्रभाव डालता है।

पीड़ित ने अगस्त के अंतिम सप्ताह से सितंबर के पहले सप्ताह के बीच कुल 1.28 करोड़ रुपये विभिन्न खातों में ट्रांसफर किए, जिन्हें पुलिस 'म्यूल अकाउंट्स' (Mule Accounts) मान रही है। यह मामला तब सामने आया जब पीड़ित की पत्नी को संदिग्ध गतिविधियों का एहसास हुआ और उन्होंने विदेश में रहने वाली अपनी बेटी को सूचित किया।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: डिजिटल अरेस्ट का बढ़ता खतरा

पिछले कुछ वर्षों में भारत में 'डिजिटल अरेस्ट' के मामलों में भारी वृद्धि हुई है। अपराधी अक्सर स्कैमर्स के नेटवर्क का उपयोग करते हैं जो विदेश से संचालित होते हैं। वे पीड़ित को घंटों तक वीडियो कॉल पर रखते हैं ताकि वे अपने परिवार या दोस्तों से संपर्क न कर सकें, जिसे 'डिजिटल कारावास' कहा जाता है।

Did You Know?: पुलिस या कोई भी सरकारी एजेंसी कभी भी वीडियो कॉल के माध्यम से किसी को 'डिजिटल अरेस्ट' नहीं करती है और न ही जांच के नाम पर पैसे की मांग करती है।

Frequently Asked Questions

1. डिजिटल अरेस्ट क्या है?
यह एक प्रकार का साइबर फ्रॉड है जहाँ अपराधी खुद को अधिकारी बताकर पीड़ित को वीडियो कॉल पर डराते हैं और उन्हें तब तक बात करने के लिए मजबूर करते हैं जब तक वे पैसे न दे दें।

2. यदि मैं ऐसे कॉल का शिकार हो जाऊं तो क्या करूं?
तुरंत 1930 साइबर हेल्पलाइन पर कॉल करें या www.cybercrime.gov.in पर अपनी शिकायत दर्ज कराएं।