मद्रास उच्च न्यायालय ने एक इंजीनियरिंग छात्र को POCSO मामले में जमानत दे दी है, जिसने शपथ पत्र में कहा है कि वह लड़की के कानूनी रूप से वयस्क होने पर उससे शादी करेगा।
- मद्रास उच्च न्यायालय ने POCSO मामले में आरोपी इंजीनियरिंग छात्र को जमानत दी।
- आरोपी ने शपथ पत्र दिया है कि वह लड़की के वयस्क होने पर जातिगत भेदभाव के बिना शादी करेगा।
- अदालत ने लड़की की सुरक्षा और उसकी पसंद का सम्मान करने की शर्त रखी है।
मद्रास उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण कानूनी मामले में एक 20 वर्षीय इंजीनियरिंग छात्र को जमानत प्रदान की है, जिस पर एक नाबालिग स्कूली छात्रा के साथ यौन शोषण का आरोप है। न्यायमूर्ति एम निर्मल कुमार की पीठ ने छात्र की उस अपील पर सुनवाई की, जिसमें निचली अदालत द्वारा उसकी जमानत याचिका खारिज किए जाने को चुनौती दी गई थी।
इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब आरोपी छात्र ने अदालत के समक्ष एक हलफनामा दायर किया। छात्र ने वचन दिया है कि वह लड़की के कानूनी रूप से विवाह योग्य आयु प्राप्त करने से पहले उस पर विवाह के लिए कोई दबाव नहीं डालेगा। इसके अलावा, उसने यह भी स्पष्ट किया कि यदि लड़की भविष्य में स्वेच्छा से उससे विवाह करना चुनती है, तो वह जाति या समुदाय के अंतर को विवाह में बाधा नहीं बनने देगा।
मामले के दो अलग-अलग पहलू
इस मामले में बचाव पक्ष और अभियोजन पक्ष के बीच विरोधाभासी बयान सामने आए हैं। बचाव पक्ष का तर्क है कि दोनों एक ही गांव के थे और उनके बीच प्रेम संबंध था, जो बाद में शारीरिक संबंधों में बदल गया। उनका कहना है कि आरोपी ने पढ़ाई पूरी करने और नौकरी पाने के बाद शादी करने का वादा किया था।
दूसरी ओर, लड़की के वकील ने गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने कहा कि यौन शोषण बलपूर्वक किया गया था और जब लड़की ने अपनी गर्भावस्था के बारे में बताया, तो आरोपी ने उसे नजरअंदाज करना शुरू कर दिया। हालांकि, अदालत ने जमानत देते समय इन विरोधाभासों पर अंतिम निर्णय नहीं सुनाया, बल्कि छात्र द्वारा दिए गए आश्वासन पर ध्यान केंद्रित किया।
Why This Matters
BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि यह मामला कानून और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच एक जटिल संतुलन को दर्शाता है। अदालत ने यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया है कि आरोपी को जमानत दी जाए, लेकिन साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाए कि पीड़िता पर किसी भी प्रकार का सामाजिक या व्यक्तिगत दबाव न बनाया जाए। यह मामला भविष्य के ऐसे मामलों में 'सहमति' और 'कानूनी आयु' की व्याख्या के लिए एक उदाहरण बन सकता है।
न्यायालय का निर्णय व्यक्तिगत स्वायत्तता और बाल संरक्षण कानूनों के बीच एक सूक्ष्म संतुलन बनाने का प्रयास है।
अदालत ने यह भी नोट किया कि आरोपी की मां और उसके पिता (जो सऊदी अरब में कार्यरत हैं) को भी भविष्य में दोनों के बीच विवाह होने पर कोई आपत्ति नहीं है। लड़की के वकील ने भी आरोपी द्वारा दिए गए हलफनामे और सुरक्षा उपायों को देखते हुए जमानत पर कोई गंभीर आपत्ति नहीं जताई।
Frequently Asked Questions
1. छात्र को जमानत क्यों दी गई?
छात्र द्वारा दिए गए इस आश्वासन के आधार पर कि वह लड़की के वयस्क होने तक प्रतीक्षा करेगा और जातिगत बाधाओं को स्वीकार नहीं करेगा, अदालत ने जमानत दी।
2. क्या यह शादी का आदेश है?
नहीं, यह केवल जमानत का आदेश है। अदालत ने शादी का आदेश नहीं दिया है, बल्कि छात्र के भविष्य के वादे को ध्यान में रखकर उसे जेल से रिहा करने की अनुमति दी है।