इरानी लेखिका‑सक्रियवादी शहरनुश पारसिपूर का 80 वर्ष की उम्र में संयुक्त राज्य अमेरिका में निधन हो गया। उनके साहित्यिक कार्य, कई बार जेल और प्रतिबंध के बावजूद, विश्वभर में नारी सशक्तिकरण के प्रतीक बने रहेंगे।
इरानी लेखिका‑सक्रियवादी शहरनुश पारसिपूर (1946‑2026) का निधन हो गया, जबकि वह तीन दशकों से अधिक समय तक राजनीतिक निर्वासन में उत्तरी कैलिफ़ोर्निया में रह रही थीं। उनका जीवन और रचना, दो अलग‑अलग इरानी शासन (शाह और इस्लामिक रिपब्लिक) के तहत चार बार जेल में बिताए गए वर्षों से परिपूर्ण है, फिर भी उन्होंने महिलाओं की आवाज़ को सशक्त करने के लिए लिखना जारी रखा।
प्रारम्भिक साहित्यिक यात्रा
पारसिपूर ने 1974 में अपना पहला उपन्यास “द डॉग एंड द लॉन्ग विंटर” प्रकाशित किया, जिससे वह स्वयं कहती हैं कि इरान में उपन्यास प्रकाशित करने वाली दूसरी महिला बन गईं, पहले सिमिन दानेशवार। इसके बाद “तौबा और द मीनींग ऑफ़ नाइट” (1989) और “वुमेन विथआउट मेन” (1989) ने उन्हें फ़ारसी साहित्य के शिखर पर स्थापित किया।
जेल और सेंसरशिप
पारसिपूर को कुल चार बार हिरासत में रखा गया—एक बार शाह के शासन के तहत और तीन बार इस्लामिक रिपब्लिक के तहत। पहला गिरफ्तारी तब हुई जब उन्होंने इरानी नेशनल रेडियो‑टेलीविजन से इस्तीफा दिया, दो बग़ी कवियों की फांसी के विरोध में। दूसरे दौर में, उनके कार में प्रतिबंधित राजनीतिक पर्चे मिलने पर उन्हें चार साल सात महीने तक बिना आरोप के जेल में रखा गया। “वुमेन विथआउट मेन” के प्रसारण के बाद दो बार फिर गिरफ्तार किया गया, जब पुस्तक का एक प्रतिलिपि अनजाने में एक सरकारी अधिकारी की पत्नी के घर पहुंच गई।
अंतर्राष्ट्रीय मान्यता और विरासत
फरिदून फ़र्रोख की अंग्रेज़ी अनुवाद “Women Without Men” को 2026 में अंतर्राष्ट्रीय बुकर पुरस्कार की लाँगलिस्ट में जगह मिली, जबकि इरान में यह पुस्तक अभी भी प्रतिबंधित है। 2009 में शिरीन नेशात ने इस उपन्यास को फिल्म में बदल कर अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार जीते। पारसिपूर का आत्मकथात्मक कार्य “Kissing the Sword” 2027 में फ़ेमिनिस्ट प्रेस द्वारा पुनः प्रकाशित होगा, जिससे नई पीढ़ी को उनकी संघर्ष यात्रा का पता चलेगा।
निर्वासन और अंतिम वर्ष
1994 में वह इरान छोड़ कर संयुक्त राज्य अमेरिका चली गईं, जहाँ उन्होंने आठ नई उपन्यास और एक और आत्मकथा लिखी। उनका मानना था कि “ईरान की महिलाएँ अब हिजाब नहीं पहनतीं, वे इस्लामिक रिपब्लिक की परवाह नहीं करतीं” और उनका कहना था कि यही परिवर्तन अंततः शासन को गिरा देगा।
स्थायी प्रभाव
पारसिपूर की रचनाएँ मिथक, जादुई यथार्थवाद और नारीवादी विचारों को मिलाकर एक ऐसा मंच तैयार करती हैं, जहाँ दमन के खिलाफ आवाज़ उठाने वाले लोगों को प्रेरणा मिलती है। उनका साहित्य न केवल इरानी संस्कृति का प्रतिबिंब है, बल्कि विश्वभर में महिलाओं के संघर्ष की सार्वभौमिक कहानी भी है।