कर्नाटक के यादगीर जिले के कंदाकुर गांव में नागपंचमी के अवसर पर श्रद्धालु जीवित बिच्छुओं को अपने शरीर पर रखकर देवी कोंडम्माई की पूजा करते हैं। मान्यता है कि देवी की कृपा से ये बिच्छू किसी को नहीं डंक मारते।
- कंदाकुर गांव में पिछले 60 वर्षों से बिच्छू मेले की परंपरा जारी है।
- श्रद्धालु देवी कोंडम्माई की प्रतिमा की पूजा करते हैं जो बिच्छू के आकार की है।
- तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र से बड़ी संख्या में भक्त इस उत्सव में शामिल होते हैं।
कर्नाटक के यादगीर जिले के गुरुमितकल तालुक स्थित कंदाकुर गांव में सोमवार को एक अत्यंत दुर्लभ और विस्मयकारी दृश्य देखने को मिला। नागपंचमी के पावन अवसर पर, जहां अधिकांश भारत में सांपों की पूजा की जाती है, यहां के श्रद्धालु जीवित बिच्छुओं को अपने हाथों, कंधों और यहां तक कि चेहरे पर रखकर पूजा-अर्चना करते हैं।
यह वार्षिक 'बिच्छू मेला' गांव की एक पहाड़ी पर स्थित देवी कोंडम्माई मंदिर में आयोजित किया जाता है। पिछले छह दशकों से चली आ रही इस परंपरा में भक्त पत्थर की एक ऐसी मूर्ति की पूजा करते हैं जो बिच्छू के समान दिखती है। दूध और प्रार्थनाओं के अर्पण के बाद, महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग पहाड़ी की चट्टानों के नीचे बिच्छुओं की खोज करते हैं और उन्हें अपने शरीर पर धारण करते हैं।
Why This Matters
BozokMedia analysis shows that this tradition represents a unique intersection of local folklore and deep-rooted faith that transcends state borders. The fact that devotees from Telangana and Maharashtra travel long distances suggests that regional identity is often superseded by spiritual belief in such niche rituals.
"The psychological comfort derived from such rituals often outweighs the biological risk in the minds of the devotees, creating a collective state of perceived immunity."
भक्तों का अटूट विश्वास है कि नागपंचमी के दिन बिच्छू बड़ी संख्या में बाहर निकलते हैं, लेकिन देवी कोंडम्माई के 'दिव्य संरक्षण' के कारण वे किसी को नुकसान नहीं पहुंचाते। नारायणपेट से आईं श्रद्धालु जयलक्ष्मी के अनुसार, वह हर साल इस उत्सव में भाग लेती हैं और उन्हें बिच्छुओं को छूने में कोई डर नहीं लगता।
हालांकि, यह परंपरा पूरी तरह जोखिम मुक्त नहीं है। पिछले दो वर्षों में डंक मारने की कुछ छिटपुट घटनाएं सामने आई हैं। इस जोखिम को देखते हुए, स्थानीय प्रशासन और कंदाकुर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र ने आयोजन स्थल पर एक अस्थायी प्राथमिक उपचार शिविर स्थापित किया है। भक्तों का मानना है कि यदि कोई डंक मारता है, तो मंदिर का पवित्र पीला पाउडर (भंडार) लगाने से दर्द कम हो जाता है।
Frequently Asked Questions
प्रश्न 1: कंदाकुर में बिच्छुओं की पूजा क्यों की जाती है?
उत्तर: यह स्थानीय परंपरा देवी कोंडम्माई के प्रति आस्था और उनके दिव्य संरक्षण में विश्वास के कारण की जाती है।
प्रश्न 2: क्या इस आयोजन के दौरान सुरक्षा के इंतजाम होते हैं?
उत्तर: हाँ, स्वास्थ्य विभाग द्वारा प्राथमिक उपचार शिविर लगाया जाता है ताकि किसी भी आकस्मिक डंक का इलाज तुरंत किया जा सके।