केरल के കൊല്ലम स्थित प्रक्कुलम सरकारी एल.पी. स्कूल ने पारंपरिक ओणम नृत्यों के बजाय प्राचीन लोक कला 'सीताकाली' को अपनाकर एक नई मिसाल पेश की है। इस आयोजन का उद्देश्य छात्रों को उनकी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ना और विलुप्त होती कलाओं के प्रति सम्मान जगाना है।
- प्रक्कुलम सरकारी एल.पी. स्कूल ने ओणम के अवसर पर पारंपरिक 'सीताकाली' का मंचन किया।
- यह कला रूप 1980 के दशक में लगभग विलुप्त हो गया था, जिसे 2017 में पुनर्जीवित किया गया।
- छात्रों ने अनुभवी कलाकारों के साथ मंच साझा कर सांस्कृतिक अनुभव प्राप्त किया।
केरल के कोल्लम जिले में स्थित प्रक्कुलम सरकारी एल.पी. स्कूल ने इस वर्ष ओणम के पारंपरिक उत्सवों में एक क्रांतिकारी बदलाव किया है। जहां आमतौर पर स्कूलों में प्रचलित लोक नृत्य और संगीत का प्रदर्शन होता है, वहीं इस स्कूल ने राज्य की प्राचीन और दुर्लभ लोक नृत्य-नाटिका 'सीताकाली' को मंच देकर एक अनूठा उदाहरण पेश किया है।
सीताकाली, जो कोल्लम की एक सदियों पुरानी कला है, का प्रदर्शन केवल एक सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि यह छात्रों के लिए एक गहन अनुभव बन गया। इस अवसर की विशेषता यह रही कि स्कूल के दो छात्रों ने पेरिनाड सीताकाली संगम के अनुभवी कलाकारों के साथ मंच साझा किया, जिससे उनके भीतर अपनी विरासत के प्रति गर्व की भावना जाग्रत हुई।
Why This Matters
BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि आधुनिकता के दौर में स्थानीय कलाओं का विलुप्त होना एक वैश्विक चुनौती है। इस तरह के स्कूली प्रयास न केवल परंपराओं को जीवित रखते हैं, बल्कि अगली पीढ़ी को उनकी पहचान से भी परिचित कराते हैं। जब छात्र किताबों में पढ़ी जाने वाली कहानियों को जीवंत रूप में देखते हैं, तो उनका जुड़ाव कहीं अधिक गहरा होता है।
"हमें अपने बच्चों को हमारी स्थानीय विरासत की जड़ों से परिचित कराने की जिम्मेदारी महसूस हुई।" - हेडमास्टर कन्नन शानमुघम
सीताकाली का ऐतिहासिक महत्व: यह कला रूप रामायण के प्रसंगों पर आधारित है, विशेष रूप से माता सीता की वन यात्रा और उनके पृथ्वी में समा जाने के मार्मिक क्षणों को दर्शाता है। इसमें लयबद्ध ताल और मधुर मलयालम गीतों का अद्भुत संगम होता है, जो दर्शकों को भावुक कर देता है।
कला का पुनरुद्धार: एक संघर्षपूर्ण यात्रा
सीताकाली का इतिहास उतार-चढ़ाव भरा रहा है। 1980 के दशक तक यह कला लगभग लुप्त हो चुकी थी क्योंकि इसके पारंपरिक अभ्यास करने वाले समुदाय आर्थिक और सामाजिक संघर्षों से जूझ रहे थे। हालांकि, 28 अगस्त 2017 को एक ऐतिहासिक मोड़ आया जब पेरिनाड ग्राम पंचायत ने इसके पुनरुद्धार का बीड़ा उठाया। टी.एन. शाजीमोन के नेतृत्व में इस कला को पुनर्गठित किया गया और कलाकारों को प्रशिक्षित किया गया, जिससे अंततः 'पेरिनाड सीताकाली संगम' का जन्म हुआ।
Frequently Asked Questions
1. सीताकाली क्या है?
सीताकाली कोल्लम की एक पारंपरिक लोक नृत्य-नाटिका है जो रामायण की कथा पर आधारित है।
2. इस कला को किसने पुनर्जीवित किया?
पेरिनाड ग्राम पंचायत और टी.एन. शाजीमोन के प्रयासों से 2017 में इसे पुनर्जीवित किया गया।