मंगलुरु में INTACH ने सरकारी स्कूल के छात्रों को पारंपरिक कलाओं से जोड़ने के लिए एक विशेष कार्यशाला आयोजित की। इसमें छात्रों ने यक्षगान और भूता कोला से प्रेरित मुखौटे और फेस पेंटिंग की बारीकियां सीखीं।

  • INTACH मंगलुरु ने सरकारी स्कूलों के छात्रों के लिए पारंपरिक कला कार्यशाला आयोजित की।
  • छात्रों ने यक्षगान और भूता कोला से प्रेरित मुखौटे बनाने की तकनीक सीखी।
  • कार्यशाला में प्राकृतिक रंगों के उपयोग और प्लास्टर ऑफ पेरिस से सांचे बनाने का प्रशिक्षण दिया गया।

मंगलुरु के बंटवाल तालुक स्थित गवर्नमेंट हाई स्कूल, मांची-कोलनाडू में हाल ही में एक अनूठी सांस्कृतिक पहल देखने को मिली। भारतीय राष्ट्रीय कला एवं सांस्कृतिक विरासत ट्रस्ट (INTACH) के मंगलुरु चैप्टर ने स्थानीय सरकारी स्कूलों के छात्रों के लिए पारंपरिक मुखौटा निर्माण और फेस पेंटिंग पर एक विशेष कार्यशाला का आयोजन किया। इस कार्यक्रम का उद्देश्य युवा पीढ़ी को तुलुनाडु की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत से परिचित कराना था।

कार्यशाला के दौरान, कलाकारों ने छात्रों को न केवल कलात्मक कौशल सिखाया, बल्कि उन्हें अपनी जड़ों से जुड़ने के लिए प्रेरित भी किया। INTACH मंगलुरु के संयोजक सुभाष चंद्र बसु ने छात्रों को संबोधित करते हुए कहा कि पारंपरिक कलाओं और क्षेत्रीय सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करना हम सभी की जिम्मेदारी है। उन्होंने जोर देकर कहा कि यदि छात्र कम उम्र से ही इन परंपराओं में रुचि लेंगे, तो यह हमारे इतिहास को जीवित रखने में महत्वपूर्ण योगदान देगा।

Why This Matters

BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि इस तरह की जमीनी स्तर की पहल केवल कला सिखाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सामाजिक पहचान को मजबूत करने का एक माध्यम है। जब सरकारी स्कूलों के छात्र पारंपरिक कलाओं जैसे यक्षगान और भूता कोला से जुड़ते हैं, तो यह सांस्कृतिक निरंतरता सुनिश्चित करता है और ग्रामीण क्षेत्रों में कला के प्रति सम्मान पैदा करता है।

कलाकार राजेंद्र केडिगे ने बताया कि मुखौटा बनाना और फेस पेंटिंग करने से छात्रों में रचनात्मकता और व्यक्तित्व का विकास होता है। उन्होंने कहा, "जब बच्चे कला की सराहना करना सीखते हैं, तो उनमें इसके प्रति गहरी संवेदनशीलता विकसित होती है।"

कला केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि हमारी पहचान को अगली पीढ़ी तक पहुँचाने का सबसे सशक्त माध्यम है।

कार्यशाला में मुख्य प्रशिक्षक के रूप में कलाकार हरीश कोडियालबैल ने भाग लिया। उन्होंने छात्रों को प्लास्टर ऑफ पेरिस और कपड़े का उपयोग करके चेहरे के सांचे (facial moulds) बनाने की व्यावहारिक प्रक्रिया सिखाई। लगभग 60 छात्रों ने विभिन्न स्कूलों के समूहों में काम करते हुए अपने स्वयं के मुखौटे तैयार किए।

वहीं, कलाकार रेशमा शेट्टी ने फेस पेंटिंग की प्रक्रिया और प्राकृतिक रंगों के उपयोग पर प्रकाश डाला। छात्रों ने सीखा कि कैसे स्थानीय स्तर पर उपलब्ध सामग्रियों से विभिन्न शेड्स और पैटर्न तैयार किए जा सकते हैं। छात्रों ने यक्षगान के पात्रों से प्रेरित होकर अपने मुखौटों को जीवंत रंगों से सजाया।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

तुलुनाडु की संस्कृति में मुखौटा निर्माण और फेस पेंटिंग का गहरा ऐतिहासिक महत्व है। भूता कोला और यक्षगान जैसी जीवित परंपराओं में, चेहरे के हाव-भाव और रंग चरित्र की पहचान और भावना को व्यक्त करने के लिए अनिवार्य हैं। यह कार्यशाला इन जटिल कला रूपों के तकनीकी और प्रतीकात्मक पहलुओं को सरल बनाकर छात्रों तक पहुँचाती है।

Did You Know?: यक्षगान में उपयोग किए जाने वाले रंग अक्सर प्राकृतिक स्रोतों जैसे हल्दी, कुमकुम और विभिन्न पौधों से प्राप्त किए जाते हैं।

Frequently Asked Questions

1. इस कार्यशाला में किन स्कूलों के छात्र शामिल हुए?
इसमें मांची-कोलनाडू सरकारी हाई स्कूल, नूजीबैलु एडेड स्कूल, मंथिमारू स्कूल, इरा प्राइमरी स्कूल और पुड्डोट्टू स्कूल के छात्र शामिल थे।

2. कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य क्या था?
इसका मुख्य उद्देश्य छात्रों को पारंपरिक कलाओं के माध्यम से तुलुनाडु की सांस्कृतिक विरासत से जोड़ना और उनकी रचनात्मकता को बढ़ावा देना था।