मक्का संयुक्त रक्षा समझौते के माध्यम से सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान ने एकजुटता दिखाने की कोशिश की है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यह अरब जगत की आंतरिक कमजोरी और अमेरिकी निर्भरता को ही उजागर करता है।

मुख्य बिंदु

  • मक्का समझौता सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान के बीच एक रक्षा गठबंधन है।
  • यह समझौता इस्लामी एकजुटता से अधिक अमेरिकी अविश्वसनीयता के खिलाफ एक 'हेज' (बचाव) है।
  • तुर्की और सऊदी अरब के बीच ऐतिहासिक मतभेद अभी भी मौजूद हैं।
  • भारत की मध्य पूर्व में बढ़ती भूमिका और पाकिस्तान की घटती साख पर चर्चा।

7 अगस्त को सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान द्वारा हस्ताक्षरित मक्का संयुक्त रक्षा समझौता वर्तमान में चर्चा का विषय बना हुआ है। हालांकि, इस गठबंधन को देखने का एक नजरिया यह भी है कि यह वास्तव में अरब दुनिया की कमजोरी को दर्शाता है। 70 साल पहले पाकिस्तान के प्रधानमंत्री हुसेन शहीद सुहरावर्दी ने कहा था कि 'शून्य प्लस शून्य प्लस शून्य अभी भी शून्य ही होता है', और आज की स्थिति में उनका यह विश्लेषण सटीक प्रतीत होता है।

इतिहास गवाह है कि पैन-अरबवाद और इस्लामी एकजुटता के नाम पर बनाए गए अधिकांश गठबंधन विफल रहे हैं। चाहे वह 1958 का संयुक्त अरब गणराज्य हो या 1981 की गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल (GCC), राष्ट्रीय हितों ने हमेशा साझा धार्मिक या जातीय पहचान को हराया है। वास्तव में, वे गठबंधन सफल रहे जिन्हें वाशिंगटन ने बनाया था, जैसे 1991 में कुवैत को मुक्त कराने के लिए अमेरिकी सैन्य शक्ति का उपयोग किया गया था।

यह क्यों महत्वपूर्ण है

BozokMedia के विश्लेषण से पता चलता है कि यह समझौता सुरक्षा आत्मनिर्भरता का प्रमाण नहीं है, बल्कि यह इस बात का संकेत है कि रियाद अब अमेरिका की अनिश्चित नीतियों पर पूरी तरह भरोसा नहीं कर सकता। डोनाल्ड ट्रंप के दौर की अस्थिरता ने सऊदी अरब को अन्य विकल्प तलाशने पर मजबूर किया है, भले ही वे विकल्प कमजोर हों।

"मक्का समझौता क्षेत्रीय सुरक्षा व्यवस्था में कोई बड़ा बदलाव नहीं है, बल्कि यह केवल तेहरान और वाशिंगटन को भेजा गया एक कूटनीतिक संकेत है।"

तुर्की और सऊदी अरब के बीच संबंध विशेष रूप से दिलचस्प हैं। कुछ साल पहले तक राष्ट्रपति एर्दोगन और क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के बीच गहरे मतभेद थे, खासकर खशोगि मामले और मुस्लिम ब्रदरहुड को लेकर। हालांकि अब वे करीब आ रहे हैं, लेकिन उनकी संरचनात्मक विरोधाभासों और नेतृत्व की महत्वाकांक्षाओं को पूरी तरह खत्म नहीं किया जा सकता।

वहीं पाकिस्तान की स्थिति एक 'पार्टनर' के बजाय एक 'रिटेनर' की रह गई है। एक समय था जब पाकिस्तान की मध्य पूर्व में मजबूत साख थी, लेकिन आर्थिक संकट और भारत के साथ तनाव ने उसे केवल सऊदी अरब के वित्तीय बेलआउट पर निर्भर बना दिया है। भारत ने भी लंबे समय तक इस क्षेत्र में एक निष्क्रिय दर्शक की भूमिका निभाई, लेकिन अब वह अपनी रणनीति बदल रहा है।

क्या आप जानते हैं?: 1956 के स्वेज संकट के दौरान, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री सुहरावर्दी ने अरब एकजुटता को 'शून्य का योग' बताया था, जिसके कारण उन्हें भारी राजनीतिक विरोध का सामना करना पड़ा था।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न 1: मक्का समझौता क्या है?
उत्तर: यह सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान के बीच हस्ताक्षरित एक संयुक्त रक्षा समझौता है जिसका उद्देश्य क्षेत्रीय सुरक्षा सहयोग बढ़ाना है।

प्रश्न 2: क्या यह समझौता अमेरिका के प्रभाव को कम करेगा?
उत्तर: नहीं, विश्लेषण के अनुसार यह समझौता अमेरिकी निर्भरता को कम करने के बजाय अमेरिकी अविश्वसनीयता के खिलाफ एक सुरक्षा कवच मात्र है।