कन्नूर विश्वविद्यालय के सिंडिकेट सदस्यों ने उपकुलपति (वीसी) पर एकतरफा निर्णय लेने, अकादमिक नियुक्तियों में अनियमितताएँ और वरिष्ठ अधिकारी की नियुक्ति को लेकर सवाल उठाए हैं। वे पारदर्शिता और नियामक प्रक्रियाओं के पालन की कड़ाई से मांग कर रहे हैं।

कन्नूर विश्वविद्यालय के सिंडिकेट के कई सदस्य ने उपकुलपति (वीसी) के खिलाफ गंभीर आरोप लगाए हैं, जिसमें उन्होंने कहा है कि वीसी ने संस्थान के प्रशासनिक मामलों को बिना सिंडिकेट की सलाह के एकतरफा रूप से संचालित किया है। इस विवाद की शुरुआत तब हुई जब सिंडिकेट सदस्य एन. सुकन्या ने मंगलवार को मीडिया को बताया कि वीसी लगातार ‘अलोकतांत्रिक और एकतरफा’ फैसले ले रहा है, जबकि मौजूदा सिंडिकेट का कार्यकाल आधिकारिक तौर पर समाप्त नहीं हुआ है।

निर्णय लेने की प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी

सुकन्या ने यह भी उजागर किया कि बोर्ड ऑफ स्टडीज के सदस्य सूची को जानबूझकर विलंबित किया गया, और चांसलर की मंजूरी बिना सिंडिकेट की भागीदारी के प्राप्त की गई, जो विश्वविद्यालय के नियमों के विरुद्ध है। उन्होंने इस बात पर भी प्रकाश डाला कि नई सिंडिकेट की सदस्यता अभी तक स्थापित नहीं हुई है, फिर भी वीसी ने कोई भी बैठक बुलाई नहीं, न ही प्रमुख प्रशासनिक निर्णयों की सूचना दी।

डायरैक्टर नियुक्ति में गंभीर प्रश्न

सिंडिकेट ने ए. प्रवीन को मालवीय मिशन टिचर्स ट्रेनिंग सेंटर के निदेशक नियुक्त करने को लेकर भी सवाल उठाए। प्रवीन, जो शारीरिक शिक्षा के निदेशक के रूप में एक वर्ष के डिप्टीशन पर थे, को अचानक शिक्षक प्रशिक्षण केंद्र के प्रमुख बनाना कई प्रक्रियात्मक असंगतियों को दिखाता है। सुकन्या ने बताया कि प्रवीन पर पांडिचेरी विश्वविद्यालय में काम करते समय कई शिकायतें, जिसमें यौन उत्पीड़न के आरोप शामिल हैं, दर्ज थीं और उन मामलों की जांच अभी भी चल रही है।

उपकुलपति का जवाब और प्रक्रिया का विवरण

उपकुलपति के.के. साजु ने इन आरोपों पर विस्तृत टिप्पणी करने से इनकार कर कहा कि सभी निर्णय नियमों और प्रक्रियाओं के अनुसार लिये गये हैं। उन्होंने कहा कि यदि कोई आरोप है तो वह खुलकर उठाया जा सकता है, लेकिन उन्होंने कोई भी गैरकानूनी कार्रवाई नहीं की है। बोर्ड ऑफ स्टडीज की सदस्यता के संबंध में उन्होंने स्पष्ट किया कि इसका चयन चांसलर द्वारा किया जाता है, जबकि सिंडिकेट का काम केवल चांसलर की नामांकन को स्वीकृति देना है।

भविष्य की राह और संभावित प्रभाव

यदि इन आरोपों को पर्याप्त सबूतों से सिद्ध किया जाता है, तो कन्नूर विश्वविद्यालय में प्रशासनिक सुधार की माँगें तेज हो सकती हैं। उच्च शिक्षा संस्थानों में पारदर्शिता और जवाबदेही को सुदृढ़ करने के लिए यह मामला एक मिसाल बन सकता है, जिससे राज्य सरकार और राष्ट्रीय शिक्षा नीतियों में भी बदलाव की संभावना उत्पन्न हो सकती है। वर्तमान में, नई सिंडिकेट की सदस्यता जल्द ही निर्धारित होने की उम्मीद है, और यह देखना बाकी है कि क्या यह विवाद संस्थान की शैक्षणिक गुणवत्ता और प्रतिष्ठा पर असर डालेगा।