भारत में स्नातक संख्या में बढ़ोतरी के बावजूद, इंजीनियरिंग में महिलाओं की enrollment सिर्फ 31% है। यह लेख इस लैंगिक अंतर के आंकड़े, कारण और संभावित समाधान को उजागर करता है।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- इंजीनियरिंग में महिलाओं की भागीदारी 31% पर स्थिर
- समाज‑सांस्कृतिक बाधाएं और रोल‑मॉडल की कमी प्रमुख कारण
- नीति, मेंटरशिप और उद्योग सहयोग से बदलाव संभव
भारत के उच्च शिक्षा संस्थानों में कुल छात्र संख्या लगातार बढ़ रही है, फिर भी इंजीनियरिंग में महिला छात्रों का अनुपात बहुत कम बना हुआ है। 2023‑24 शैक्षणिक वर्ष के All India Survey on Higher Education (AISHE) के अनुसार, कुल इंजीनियरिंग प्रवेश में केवल 31 % महिलाएं हैं, जबकि चिकित्सा शिक्षा में उनका हिस्सा 57 % तक पहुँच गया है। यह असंतुलन न केवल लैंगिक समानता के सिद्धांत को चुनौती देता है, बल्कि देश की तकनीकी प्रतिभा पूल को भी सीमित करता है।
पिछले पाँच वर्षों की प्रवृत्ति
2019‑20 से 2023‑24 के बीच, कुल स्नातक संख्या में 18.3 % की वृद्धि हुई, जिसमें महिला छात्रों की संख्या 1.89 करोड़ से बढ़कर 2.24 करोड़ हुई। हालांकि, इंजीनियरिंग में उनका हिस्सा 2019‑20 के 29.2 % से थोड़ा बढ़कर 2023‑24 में 31 % ही रहा। इस स्थिरता का अर्थ है कि कुल स्नातक वृद्धि का अधिकांश लाभ पुरुषों ने उठाया, जबकि महिलाओं ने अपने शैक्षणिक विकल्पों को मुख्यतः चिकित्सा और प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में सीमित रखा।
समाज‑सांस्कृतिक और संरचनात्मक बाधाएँ
इस अंतर के पीछे कई जटिल कारण हैं। पारिवारिक अपेक्षाएँ अक्सर महिलाओं को सुरक्षित और स्थिर करियर विकल्पों की ओर धकेलती हैं, जबकि इंजीनियरिंग को जोखिम भरा और पुरुष प्रधान माना जाता है। स्कूल स्तर पर STEM (विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग, गणित) विषयों में लड़कियों को पर्याप्त प्रेरणा या रोल‑मॉडल नहीं मिलते, जिससे उनका आत्मविश्वास कम हो जाता है। इसके अलावा, कई विश्वविद्यालयों में लैब सुविधाओं, इंटर्नशिप अवसरों और कैंपस सुरक्षा के संदर्भ में महिला‑मैत्रीपूर्ण माहौल की कमी भी एक बड़ी बाधा है।
आर्थिक और सामाजिक प्रभाव
इंजीनियरिंग में महिला प्रतिभा का अपव्यय भारत की नवाचार क्षमता को घटाता है। विश्व बैंक के एक अध्ययन के अनुसार, यदि महिलाओं को विज्ञान‑प्रौद्योगिकी क्षेत्रों में समान अवसर मिलें, तो भारत की GDP में 2‑3 % की अतिरिक्त वृद्धि संभव है। साथ ही, विविधता वाली कार्यस्थलें अधिक रचनात्मक और उत्पादक मानी जाती हैं, जिससे उद्योग की प्रतिस्पर्धात्मकता भी बढ़ती है।
संभावित समाधान और नीति दिशा‑निर्देश
सरकार और निजी क्षेत्र को मिलकर कई कदम उठाने चाहिए। पहला, छात्रवृत्ति और वित्तीय सहायता के माध्यम से लड़कियों को इंजीनियरिंग की ओर आकर्षित करना आवश्यक है। दूसरा, स्कूल‑स्तर पर STEM‑आधारित कार्यक्रम, महिला‑मेंटरशिप और एंटी‑बायस प्रशिक्षण को अनिवार्य बनाना चाहिए। तीसरा, उद्योग के साथ साझेदारी करके इंटर्नशिप, को‑ऑप प्रोग्राम और रीयल‑वर्ल्ड प्रोजेक्ट प्रदान करने से छात्रों में व्यावहारिक कौशल का विकास होगा। अंत में, कैंपस सुरक्षा और लैंगिक‑सुरक्षा मानकों को कड़ाई से लागू करके महिलाओं को एक सुरक्षित शैक्षणिक वातावरण देना चाहिए।
इन बहु‑आयामी उपायों के सफल कार्यान्वयन से न केवल महिलाओं की इंजीनियरिंग में भागीदारी बढ़ेगी, बल्कि भारत की तकनीकी विकास यात्रा भी तेज़ होगी।