CBSE ने बताया कि 28,848 संबद्ध स्कूलों में से 47.3% कक्षा 9 के छात्रों को दो या अधिक भारतीय भाषाएँ पढ़ाते हैं, जिससे तीन‑भाषा नीति का पालन बिना अतिरिक्त शिक्षक के संभव है। यह बयान दिल्ली‑गुड़गांव‑नोएडा‑चेन्नई के अभिभावकों और शिक्षकों द्वारा दायर याचिका के उत्तर में सुप्रीम कोर्ट में प्रस्तुत किया गया।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- CBSE ने बताया कि 47.3% स्कूल दो या अधिक भारतीय भाषाएँ पढ़ाते हैं
- सुप्रीम कोर्ट में तीन‑भाषा नीति की वैधता पर बहस चल रही है
- विदेशी भाषा शिक्षण पर भी बोर्ड ने स्पष्ट किया कि कोई प्रतिबंध नहीं है
नई दिल्ली – केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) ने सोमवार को एक प्रतिवादी हलफ़नामा में कहा कि बोर्ड से संबद्ध 28,848 स्कूलों में से 47.3% ने पहले ही कक्षा 9 के छात्रों को दो या अधिक भारतीय भाषाएँ पढ़ाने की व्यवस्था कर ली है। यह आंकड़ा बोर्ड की तीन‑भाषा नीति के प्रति अनुपालन दर्शाता है, जिसमें कम से कम दो भारतीय भाषाएँ अनिवार्य हैं, जबकि शेष एक वैकल्पिक विदेशी भाषा हो सकती है।
पृष्ठभूमि और कानूनी चुनौती
दिल्ली, गुड़गांव, नोएडा और चेन्नई के अभिभावकों तथा कुछ विदेशी‑भाषा शिक्षकों ने CBSE के 15 मई के परिपत्र को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। वे तर्क देते हैं कि 1 जुलाई, 2026 से लागू होने वाला यह परिपत्र अनुच्छेद 14, 19, 21 और 21A के तहत असंवैधानिक है, क्योंकि यह 36 दिन पहले जारी नोटिफिकेशन को उलट देता है जिसमें कहा गया था कि तीसरी भाषा (R3) 2029‑30 शैक्षणिक सत्र तक लागू नहीं होगी।
बोर्ड का बचाव और व्यावहारिक कदम
CBSE ने उत्तर में कहा कि अधिकांश स्कूलों में पहले से ही दो भारतीय भाषाएँ उपलब्ध हैं और 99.19% स्कूलों में कम से कम एक भारतीय‑भाषा शिक्षक नियुक्त है। बोर्ड ने यह भी स्पष्ट किया कि अस्थायी रूप से “कार्यात्मक दक्षता” वाले शिक्षकों को तीसरी भाषा पढ़ाने की अनुमति दी गई है, ताकि स्कूलों को पूरी क्षमता बनाने में समय मिल सके। इसके अतिरिक्त, शिक्षा मंत्रालय और एनसीईआरटी ने भी समर्थन में हलफ़नामे दायर किए, जिसमें बताया गया कि 22 अनुसूचित भाषाओं में पाठ्यपुस्तकों की तैयारियां पहले ही पूरी हो चुकी हैं।
विदेशी भाषा की स्थिति
याचिकाकर्ताओं का दावा है कि नई नीति विदेशी भाषाओं को स्कूलों से बाहर कर रही है। बोर्ड ने इस बात को खारिज करते हुए कहा कि विदेशी भाषा पढ़ाई पर कोई प्रतिबंध नहीं है और इसे तीन‑भाषा ढांचे के भीतर या चौथी वैकल्पिक भाषा के रूप में जारी रखा जा सकता है। इस प्रकार, नीति का उद्देश्य भारतीय भाषाओं को सुदृढ़ करना है, न कि विदेशी भाषा सीखने के अवसर को घटाना।
भविष्य की संभावनाएँ
यदि सुप्रीम कोर्ट इस नीति को बरकरार रखता है, तो भारत में बहुभाषी शिक्षा के दिशा-निर्देशों में एक नया मोड़ आएगा। यह न केवल छात्रों को अपनी मातृभाषा में गहराई से निपुण बनाएगा, बल्कि वैश्विक प्रतिस्पर्धा में भी भारतीय भाषा कौशल को एक रणनीतिक संपत्ति बना सकता है। दूसरी ओर, यदि अदालत इस याचिका को स्वीकार करती है, तो बोर्ड को नई समयसीमा के साथ पाठ्यक्रम, शिक्षक प्रशिक्षण और मूल्यांकन ढांचे को पुनः तैयार करना पड़ेगा।