सुप्रीम कोर्ट ने CBSE की त्रिभाषा नीति पर गंभीर सवाल उठाए हैं। जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि तीसरी भाषा कक्षा 9 में शुरू होने के बजाय तब तक समाप्त हो जानी चाहिए थी।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • सुप्रीम कोर्ट ने CBSE की 2026-27 की त्रिभाषा नीति पर रोक लगाने से इनकार किया, लेकिन नीति की संरचना पर सवाल उठाए।
  • जस्टिस नागरत्ना ने तर्क दिया कि तीसरी भाषा कक्षा 9 में शुरू करना तर्कसंगत नहीं है; इसे प्राथमिक स्तर पर ही सीखना चाहिए।
  • अभिभावकों ने स्कूलों में प्रशिक्षित शिक्षकों और बुनियादी ढांचे की कमी का मुद्दा उठाया है।
  • कोर्ट ने केंद्र सरकार और CBSE से 10 दिनों के भीतर जवाब मांगा है।

नई दिल्ली: केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) की प्रस्तावित त्रिभाषा नीति को लेकर देश में कानूनी और शैक्षणिक बहस छिड़ गई है। मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने 2026-27 शैक्षणिक सत्र के लिए लागू होने वाली इस नीति पर रोक लगाने से इनकार कर दिया, लेकिन मामले की गंभीरता को देखते हुए बेंच ने नीति के ढांचे पर तीखे सवाल खड़े किए हैं।

जस्टिस नागरत्ना की महत्वपूर्ण टिप्पणी

सुनवाई के दौरान, मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस बी.वी. नागरत्ना की पीठ ने इस बात पर गहरी चिंता व्यक्त की कि छात्रों के स्कूली जीवन के मध्य में, यानी कक्षा 9 में, तीसरी भाषा का बोझ क्यों डाला जा रहा है। जस्टिस नागरत्ना ने स्पष्ट रूप से कहा, "तीसरी भाषा कक्षा 9 में शुरू नहीं होनी चाहिए, बल्कि उस स्तर तक आते-आते इसकी पढ़ाई समाप्त हो जानी चाहिए थी।" उन्होंने तर्क दिया कि बच्चे प्रारंभिक वर्षों में नई भाषाएं सीखने में अधिक सक्षम होते हैं, न कि माध्यमिक विद्यालय के कठिन चरणों में।

अभिभावकों की चिंता और जमीनी हकीकत

यह मामला उन अभिभावकों द्वारा दायर याचिकाओं से उपजा है जिनके बच्चे वर्तमान में कक्षा 5 और 6 में पढ़ रहे हैं। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि CBSE की यह संशोधित नीति कागजों पर तो प्रभावी दिखती है, लेकिन जमीनी स्तर पर इसका कार्यान्वयन एक बड़ी चुनौती है। स्कूलों के पास न तो पर्याप्त प्रशिक्षित शिक्षक हैं और न ही विभिन्न भारतीय भाषाओं के लिए आवश्यक पाठ्यपुस्तकें और बुनियादी ढांचा उपलब्ध है।

नीति का स्वरूप और भविष्य की राह

CBSE की नई योजना के अनुसार, 2026-27 से कक्षा 9 के छात्रों के लिए तीन भाषाओं का अध्ययन अनिवार्य होगा, जिनमें से कम से कम दो भारतीय भाषाएं होनी चाहिए। हालांकि, राहत की बात यह है कि तीसरी भाषा का मूल्यांकन बोर्ड परीक्षा के बजाय स्कूलों द्वारा आंतरिक रूप से किया जाएगा। यह मामला राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के बहुभाषी दृष्टिकोण से गहराई से जुड़ा है। सुप्रीम कोर्ट अब इस बात की जांच करेगा कि क्या यह नीति छात्रों पर अनावश्यक शैक्षणिक दबाव तो नहीं डाल रही है।