नीति आयोग की रिपोर्ट ने खुलासा किया है कि पिछले दशक में लगभग 94,000 सरकारी स्कूल बंद हो गए हैं। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि कैसे स्कूलों के युक्तिकरण (rationalisation) के नाम पर गरीब और ग्रामीण बच्चों की शिक्षा पर संकट मंडरा रहा है।
मुख्य बिंदु
- पिछले 10 वर्षों में लगभग 94,000 सरकारी स्कूल बंद कर दिए गए हैं।
- सरकारी स्कूलों में नामांकन का हिस्सा 71% से घटकर 49.24% रह गया है।
- मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में स्कूलों के बंद होने की दर सबसे अधिक है।
- स्कूलों के विलय से गरीब, अनुसूचित जाति और जनजाति के बच्चों पर सबसे बुरा असर पड़ रहा है।
भारत में शिक्षा के बुनियादी ढांचे में एक खतरनाक बदलाव देखा जा रहा है। नीति आयोग की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, पिछले एक दशक में औसतन 25 सरकारी स्कूल प्रतिदिन बंद हुए हैं। इस प्रक्रिया ने देश में सरकारी स्कूलों में होने वाले नामांकन में 2.26 करोड़ की भारी गिरावट दर्ज की है। साल 2005 में जहाँ कुल छात्रों में सरकारी स्कूलों की हिस्सेदारी 71% थी, वहीं 2024-25 तक यह गिरकर मात्र 49.24% रह गई है।
सरकार इन बंदिंग्स को 'स्कूल युक्तिकरण' (Rationalisation) का नाम दे रही है। हालांकि, राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 कहती है कि युक्तिकरण ऐसा होना चाहिए जिससे 'पड़ोस के स्कूल' (Neighbourhood Schools) की अवधारणा को खतरा न हो। लेकिन जमीनी हकीकत इसके उलट है। यह केवल जनसांख्यिकीय बदलाव नहीं है, बल्कि एक प्रशासनिक निर्णय है जो ग्रामीण और गरीब बच्चों को शिक्षा से दूर कर रहा है।
क्यों यह चिंता का विषय है?
BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि स्कूलों के बंद होने का सबसे बड़ा बोझ समाज के सबसे कमजोर वर्गों पर पड़ रहा है। सरकारी स्कूल मुख्य रूप से अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले परिवारों के बच्चों के लिए एकमात्र सहारा हैं। जब पास का स्कूल बंद हो जाता है, तो सबसे पहले लड़कियों की शिक्षा पर प्रहार होता है, क्योंकि लंबी दूरी तय करना उनके लिए चुनौतीपूर्ण होता है।
स्कूलों का युक्तिकरण यदि समावेशी नहीं है, तो यह शिक्षा के अधिकार (RTE) का सीधा उल्लंघन है।
प्रभावित होने वाले प्रमुख राज्य
उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और जम्मू-कश्मीर इस संकट के केंद्र में हैं। मध्य प्रदेश में स्थिति भयावह है, जहाँ 7.37 लाख बच्चों का कोई स्कूल रिकॉर्ड नहीं है। जम्मू-कश्मीर में, युक्तिकरण के कारण बच्चों को अब स्कूल पहुँचने के लिए प्रतिदिन 4 से 6 किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है, जो RTE के नियमों का उल्लंघन है।
| राज्य | स्कूलों की संख्या में गिरावट (अनुमानित) | प्रमुख प्रभाव |
|---|---|---|
| उत्तर प्रदेश | 25,000+ | ग्रामीण क्षेत्रों में स्कूलों का विलय |
| मध्य प्रदेश | 22,600+ | लाखों बच्चे 'ड्रॉप बॉक्स' श्रेणी में |
| जम्मू-कश्मीर | ~4,300 | लंबी दूरी तय करने की मजबूरी |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. 'ड्रॉप बॉक्स' श्रेणी का क्या मतलब है?
यह उन बच्चों के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला शब्द है जो स्कूल छोड़ने के कगार पर हैं या जिनका कोई आधिकारिक नामांकन नहीं है।
2. क्या केंद्र सरकार इसमें हस्तक्षेप कर सकती है?
शिक्षा समवर्ती सूची में है, लेकिन शिक्षा का अधिकार (RTE) एक केंद्रीय कानून है, इसलिए केंद्र की जिम्मेदारी भी बनती है।