जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) का अनूठा 'डिप्रिवेशन पॉइंट्स' मॉडल कैसे सामाजिक और क्षेत्रीय असमानताओं को दूर कर वंचित छात्रों को प्रवेश में मदद करता है, यहाँ विस्तार से समझें।

  • डिप्रिवेशन पॉइंट्स मॉडल का उद्देश्य पिछड़े क्षेत्रों, महिलाओं और ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को प्रवेश में प्राथमिकता देना है।
  • यह प्रणाली छात्र के प्रवेश परीक्षा स्कोर में अधिकतम 12 अतिरिक्त अंक जोड़ सकती है।
  • यह मॉडल क्षेत्रीय विकास संकेतकों जैसे महिला साक्षरता और ग्रामीण जनसंख्या पर आधारित है।

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) की प्रवेश प्रक्रिया अपनी एक विशिष्ट पहचान रखती है, जिसका मुख्य आधार दशकों पुराना 'डिप्रिवेशन पॉइंट्स' (Deprivation Points) मॉडल है। 1970 के दशक में शुरू की गई यह प्रणाली केवल शैक्षणिक योग्यता को ही एकमात्र पैमाना नहीं मानती, बल्कि उन सामाजिक और क्षेत्रीय चुनौतियों को भी ध्यान में रखती है जिनका सामना छात्र ने अपनी शिक्षा के दौरान किया है।

इस मॉडल के तहत, आवेदकों को उनके सामाजिक और भौगोलिक परिवेश के आधार पर अधिकतम 12 अंक तक दिए जा सकते हैं। ये अंक छात्र के प्रवेश परीक्षा के अंकों में जोड़ दिए जाते हैं, जिससे मेरिट सूची तैयार करते समय उन छात्रों को बढ़त मिलती है जो संसाधनों की कमी वाले क्षेत्रों से आते हैं।

यह कैसे काम करता है?

JNU जिला स्तर पर पिछड़ेपन को मापने के लिए जनगणना के आंकड़ों का उपयोग करता है। जिलों को दो श्रेणियों में बांटा जाता है: क्वाटाइल 1 (पिछड़ा) और क्वाटाइल 2 (कम पिछड़ा)। इन श्रेणियों का निर्धारण महिला निरक्षरता, कृषि श्रमिकों का प्रतिशत, ग्रामीण जनसंख्या और स्वच्छता सुविधाओं की कमी जैसे संकेतकों के आधार पर किया जाता है।

प्रवेश स्तरक्वाटाइल 1 (अंक)क्वाटाइल 2 (अंक)
स्नातक (UG)6 अंक4 अंक
स्नातकोत्तर (PG)3 अंक2 अंक

इसके अलावा, कश्मीरी प्रवासियों को 5 अंक दिए जाते हैं। महिला और ट्रांसजेंडर उम्मीदवारों के लिए भी विशेष प्रावधान हैं, जहाँ उन्हें उनकी श्रेणी (SC/ST/OBC/PwD) के आधार पर 5 से 7 अंक तक मिल सकते हैं।

Why This Matters

BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि JNU का यह मॉडल केवल आरक्षण का विस्तार नहीं है, बल्कि यह 'अवसर की समानता' सुनिश्चित करने का एक सूक्ष्म प्रयास है। जहाँ सामान्य आरक्षण जातिगत आधार पर काम करता है, वहीं डिप्रिवेशन पॉइंट्स भौगोलिक और आर्थिक विषमता को संबोधित करते हैं।

"जब JNU की स्थापना हुई, तो इसका उद्देश्य केवल दिल्ली के लिए नहीं, बल्कि पूरे देश की प्रतिभा को आकर्षित करना था।" - प्रोफेसर सूरजित मजूमदार

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

डिप्रिवेशन पॉइंट्स प्रणाली को 1970 के दशक में पेश किया गया था। हालांकि 1984 में इसे वापस ले लिया गया था, लेकिन छात्र संघों के भारी दबाव के बाद 1995-96 शैक्षणिक वर्ष से इसे फिर से लागू कर दिया गया। यह प्रणाली सुनिश्चित करती है कि विश्वविद्यालय केवल उन छात्रों का समूह न बन जाए जो पहले से ही संपन्न शैक्षिक वातावरण का लाभ उठा चुके हैं।

Did You Know?: JNU के इस मॉडल ने शिक्षा के क्षेत्र में 'समानता बनाम समानता' (Equality vs Equity) की बहस को वैश्विक स्तर पर मजबूती दी है।

Frequently Asked Questions

1. क्या यह मॉडल PhD प्रवेश पर लागू होता है?
नहीं, 2017 में UGC दिशानिर्देशों के बाद PhD कार्यक्रमों के लिए इसे हटा दिया गया था।

2. क्या यह मॉडल केवल पिछड़ी जातियों के लिए है?
नहीं, यह भौगोलिक पिछड़ेपन और लिंग (Gender) आधारित असमानता पर भी केंद्रित है।