गुजरात के विश्वविद्यालयों में छात्र संघ चुनावों के अभाव के बीच, पेपर लीक और छात्र अधिकारों जैसे मुद्दों पर Gen Z का आक्रोश बढ़ रहा है। छात्र नेता अब कैंपस में लोकतंत्र की बहाली की मांग कर रहे हैं।
- गुजरात के विश्वविद्यालयों में लंबे समय से छात्र संघ चुनाव नहीं हुए हैं।
- Gen Z छात्र अब पेपर लीक, फीस वृद्धि और छात्रवृत्ति में देरी जैसे मुद्दों पर मुखर हैं।
- छात्र संगठनों का मानना है कि चुनाव न होने से छात्रों की आवाज सरकार तक नहीं पहुँच पा रही है।
गुजरात के शैक्षणिक संस्थानों में वर्तमान स्थिति एक बड़े बदलाव की ओर इशारा कर रही है। हालांकि राज्य के बड़े विश्वविद्यालयों, जैसे गुजरात विश्वविद्यालय, में पिछले कई वर्षों से छात्र संघ चुनाव नहीं हुए हैं, लेकिन छात्र राजनीति पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। इसके बजाय, छात्रों का ध्यान अब अकादमिक मुद्दों, जैसे NEET पेपर लीक, फीस वृद्धि और सरकारी छात्रवृत्ति में हो रही देरी की ओर स्थानांतरित हो गया है।
हाल ही में दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए विरोध प्रदर्शनों ने इस बहस को फिर से जीवित कर दिया है। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) के राष्ट्रीय सचिव श्रवण बी राज ने संकेत दिया कि भारत की 'Gen Z' अब केवल मूकदर्शक बनकर नहीं रहना चाहती। छात्रों के बीच यह भावना प्रबल हो रही है कि वे अपने अधिकारों के लिए लड़ना जानते हैं।
Why This Matters
BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि छात्र राजनीति का अभाव शासन और छात्रों के बीच एक संवादहीनता (communication gap) पैदा कर रहा है। जब कैंपस में चुनाव नहीं होते, तो छात्र नेतृत्व का एक औपचारिक ढांचा नहीं बन पाता, जिससे उनकी समस्याओं का समाधान नीतिगत स्तर पर करना कठिन हो जाता है।
छात्रों के पास प्रतिनिधित्व की कमी उनके शैक्षणिक भविष्य और सामाजिक अधिकारों को सीधे प्रभावित कर रही है।
विभिन्न छात्र संगठनों के नेताओं के बीच इस मुद्दे पर अलग-अलग मत हैं। ABVP के गुजरात राज्य सचिव देवंश ब्रह्मभट्ट का कहना है कि छात्रों की राजनीति में रुचि कम नहीं हुई है, बल्कि उनका एजेंडा बदल गया है। उन्होंने गुजरात कॉमन एडमिशन सर्विस (GCAS) की खामियों और शिक्षकों की कमी जैसे गंभीर मुद्दों को उठाया।
दूसरी ओर, NSUI के गुजरात महासचिव राहुल थरोड़ा ने बताया कि छात्र अब राजनीतिक संगठनों के बजाय अपने अकादमिक करियर पर अधिक ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। उन्होंने GCAS प्रक्रिया के लंबा खिंचने और कॉलेजों में स्थायी शिक्षकों की कमी पर भी चिंता जताई। वहीं, AAP के छात्र विंग के नेता धार्मिक मठकिया ने तर्क दिया कि हिंसा के डर से चुनाव रोकना समाधान नहीं है, बल्कि सुरक्षा बढ़ाकर लोकतंत्र को जीवित रखना चाहिए।
ऐतिहासिक दृष्टि से देखें तो गुजरात का छात्र आंदोलन हमेशा से शक्तिशाली रहा है। 1974 का नवनिर्माण आंदोलन इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, जिसने राज्य की राजनीति की दिशा बदल दी थी। वर्तमान में, छात्र नेता इसी तरह के संगठित आंदोलन की क्षमता को फिर से तलाश रहे हैं।
Frequently Asked Questions
प्रश्न 1: गुजरात में छात्र संघ चुनाव कब से नहीं हुए हैं?
उत्तर: उदाहरण के तौर पर, गुजरात विश्वविद्यालय में आखिरी चुनाव 2020 में हुए थे।
प्रश्न 2: छात्र वर्तमान में किन प्रमुख मुद्दों पर विरोध कर रहे हैं?
उत्तर: छात्र मुख्य रूप से पेपर लीक, फीस वृद्धि, छात्रवृत्ति में देरी और शिक्षकों की कमी जैसे मुद्दों पर विरोध कर रहे हैं।