बेजबरुआ समिति की सिफारिशों के बाद पूर्वोत्तर भारत के छात्रों के लिए विशेष रूप से बनाए गए जेएनयू के बराक हॉस्टल में आरक्षण नियमों की अनदेखी और बुनियादी ढांचे की बदहाली का मामला सामने आया है।
- बराक हॉस्टल में पूर्वोत्तर छात्रों के लिए 75:25 का आरक्षण तय था, लेकिन वर्तमान में केवल 12% छात्र ही इस क्षेत्र से हैं।
- ₹28.30 करोड़ की लागत से बनी इस इमारत की दीवारों पर काई जम गई है और प्लास्टर उखड़ रहा है।
- यह परियोजना 2014 में निडो तानियाम की नस्लीय हत्या के बाद पूर्वोत्तर छात्रों को सुरक्षित आवास देने के लिए शुरू की गई थी।
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) का बराक हॉस्टल, जिसे पूर्वोत्तर भारत के छात्रों के लिए एक सुरक्षित ठिकाने के रूप में देखा गया था, अब प्रशासनिक विफलता और टूटे वादों का प्रतीक बन गया है। ₹28 करोड़ से अधिक की लागत से बनी यह सुविधा उन छात्रों के लिए थी जिन्होंने देश के अन्य हिस्सों में भेदभाव का सामना किया, लेकिन यह जनसांख्यिकीय और ढांचागत दोनों स्तरों पर विफल रही है।
इस हॉस्टल की नींव 2014 की एक दुखद घटना से जुड़ी है, जब अरुणाचल प्रदेश के 18 वर्षीय छात्र निडो तानियाम की दिल्ली में नस्लीय नफरत के कारण बेरहमी से हत्या कर दी गई थी। इस घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया, जिसके बाद गृह मंत्रालय ने बेजबरुआ समिति का गठन किया। समिति ने स्पष्ट किया कि पूर्वोत्तर के छात्रों के लिए समर्पित और सुरक्षित आवास की तत्काल आवश्यकता है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
समिति की रिपोर्ट के बाद, पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास मंत्रालय (DoNER) और उत्तर पूर्वी परिषद (NEC) ने इस परियोजना को वित्तपोषित किया। एक समझौता ज्ञापन (MoU) के तहत यह तय किया गया था कि हॉस्टल की 75% सीटें पूर्वोत्तर के छात्रों के लिए आरक्षित होंगी। हालांकि, 2017 में डॉ. जितेंद्र सिंह द्वारा शिलान्यास के बावजूद, यह इमारत 2024 में पूरी हुई और अप्रैल 2025 में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और कुलपति शांतिश्री डी. पंडित द्वारा इसका उद्घाटन किया गया।
यह क्यों महत्वपूर्ण है
BozokMedia के विश्लेषण से पता चलता है कि 75% आरक्षण को लागू करने में विफलता केवल एक लिपिकीय त्रुटि नहीं है, बल्कि उन सामाजिक सुरक्षा वादों की अनदेखी है जो हाशिए पर रहने वाले क्षेत्रीय समूहों से किए गए थे। जब एक संस्थान नस्लीय बहिष्कार को रोकने के लिए इमारत बनाता है और फिर उन्हीं लोगों को वहां जगह नहीं मिलती, तो यह विश्वविद्यालय की समावेशिता के दावों पर सवाल उठाता है।
बेजबरुआ समिति के नीतिगत इरादों और बराक हॉस्टल की जमीनी हकीकत के बीच का अंतर संस्थागत जवाबदेही की भारी कमी को दर्शाता है।
सिर्फ आरक्षण ही नहीं, बल्कि हॉस्टल की हालत भी दयनीय है। छात्रों का कहना है कि महज दो साल में दीवारों पर काई जम गई है, शौचालय की सीटें टूटी हुई हैं और बालकनियों में जलजमाव की समस्या है। इसके अलावा, हॉस्टल में मेस की सुविधा नहीं है और वाई-फाई की स्थिति बेहद खराब है।
| विशेषता | वादा/योजना | वर्तमान स्थिति |
|---|---|---|
| पूर्वोत्तर आरक्षण | 75% (320 सीटें) | लगभग 12% |
| बुनियादी ढांचा | आधुनिक सुविधा | उखड़ता प्लास्टर, टूटे दरवाजे, काई वाली दीवारें |
| सुविधाएं | पूर्ण हॉस्टल सेवाएं | मेस की सुविधा नहीं, खराब वाई-फाई |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: बराक हॉस्टल क्यों बनाया गया था?
इसे पूर्वोत्तर भारत के छात्रों को नस्लीय भेदभाव और असुरक्षा से बचाने के लिए एक सुरक्षित और समर्पित आवास प्रदान करने के उद्देश्य से बनाया गया था।
प्रश्न 2: हॉस्टल के निर्माण के लिए फंड किसने दिया?
हॉस्टल का 100% निर्माण खर्च उत्तर पूर्वी परिषद (NEC) द्वारा वहन किया गया, जिसकी कुल लागत ₹28.30 करोड़ थी।