केरल के वामपंथी शैक्षणिक संगठनों ने फोर-ईयर अंडरग्रेजुएट प्रोग्राम (FYUGP) की समीक्षा पर आपत्ति जताई है, इसे विश्वविद्यालय की स्वायत्तता और शैक्षणिक ढांचे के लिए खतरा बताया है।
- वामपंथी संगठनों ने KSHEC द्वारा FYUGP की अंतरिम समीक्षा का कड़ा विरोध किया है।
- विश्वविद्यालय की स्वायत्तता और आउटकम-बेस्ड एजुकेशन (OBE) के साथ टकराव की आशंका।
- NEP 2020 के प्रावधानों को चुपके से लागू करने के प्रयासों का विरोध।
- कार्यभार सुरक्षा और संकाय विकास कार्यक्रमों की मांग।
केरल के शैक्षणिक परिदृश्य में एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। केरल राज्य उच्च शिक्षा परिषद (KSHEC) द्वारा फोर-ईयर अंडरग्रेजुएट प्रोग्राम (FYUGP) की अंतरिम समीक्षा के कई सुझावों पर वामपंथी समर्थित सेवा संगठनों ने कड़ी आपत्ति जताई है। संगठनों का कहना है कि ये बदलाव मौजूदा शैक्षणिक ढांचे को नुकसान पहुँचा सकते हैं और आउटकम-बेस्ड एजुकेशन (OBE) के सिद्धांतों के विपरीत हैं।
CPI(M) समर्थित ऑल केरल प्राइवेट कॉलेज टीचर्स एसोसिएशन (AKPCTA) ने परिषद को एक विस्तृत नीति प्रतिक्रिया सौंपी है। एसोसिएशन का तर्क है कि समीक्षा समिति की सिफारिशें अभी भी पुराने 'चॉइस बेस्ड क्रेडिट एंड सेमेस्टर सिस्टम' (CBCSS) की मानसिकता से प्रेरित हैं, जबकि FYUGP के तहत एक पूरी तरह से नया मूल्यांकन ढांचा अपनाया गया है।
यह क्यों महत्वपूर्ण है
BozokMedia के विश्लेषण के अनुसार, यह विवाद केवल प्रशासनिक शब्दावली का नहीं है, बल्कि केरल में उच्च शिक्षा की वैचारिक दिशा को लेकर एक बड़ा संघर्ष है। केंद्रीय परिषद की सिफारिशों और विश्वविद्यालय की स्वायत्तता के बीच का यह तनाव यह दर्शाता है कि मानकीकरण और शैक्षणिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाना कितना कठिन है।
AKPCTA ने ब्लूम्स टैक्सोनॉमी (Bloom’s Taxonomy) की व्याख्या पर भी सवाल उठाए हैं। उनका दावा है कि रिपोर्ट केवल संज्ञानात्मक (cognitive) क्षेत्र पर ध्यान केंद्रित करती है और भावनात्मक एवं साइकोमोटर क्षेत्रों की अनदेखी करती है। यह मानना कि सभी पाठ्यक्रमों को छात्रों का मूल्यांकन 'क्रिएट' (Create) स्तर पर करना चाहिए, व्यावहारिक रूप से असंभव और शिक्षाशास्त्र के विरुद्ध है।
एक अंतर-विश्वविद्यालय अध्ययन बोर्ड के माध्यम से शैक्षणिक शक्तियों का केंद्रीकरण राज्य में विश्वविद्यालय की स्वायत्तता के लिए एक खतरनाक मिसाल बन सकता है।
एक अन्य विवादित प्रस्ताव अंतर-विश्वविद्यालय अध्ययन बोर्ड समिति के गठन का है। संगठन का कहना है कि KSHEC केवल एक सलाहकार निकाय है और उसके पास विश्वविद्यालयों की वैधानिक शक्तियों को खत्म करने का कोई अधिकार नहीं है। किसी भी ऐसे निकाय को केवल सहयोगी होना चाहिए, न कि बाध्यकारी।
इस पूरे विवाद के केंद्र में राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 है। AKPCTA ने आरोप लगाया है कि FYUGP समीक्षा की आड़ में NEP के प्रावधानों को लागू करने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने मांग की है कि राज्य सरकार पहले NEP 2020 पर अपनी स्पष्ट नीति साझा करे।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: मूल्यांकन के संबंध में AKPCTA की मुख्य आपत्ति क्या है?
AKPCTA का मानना है कि सभी छात्रों को 'क्रिएट' स्तर पर आंकना अव्यावहारिक है और यह केवल संज्ञानात्मक डोमेन तक सीमित है।
इसे KSHEC द्वारा अपनी सलाहकार भूमिका से आगे बढ़कर विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता में हस्तक्षेप के रूप में देखा जा रहा है।