भारत में आयुष चिकित्सा शिक्षा के तेजी से विस्तार के बीच निजी संस्थानों की बढ़ती संख्या और गुणवत्ता नियंत्रण की कमी ने गंभीर चिंताएं पैदा कर दी हैं। रिपोर्ट के अनुसार, बुनियादी ढांचे और संकायों की कमी के बावजूद प्रवेश क्षमता में भारी वृद्धि हुई है।
- आयुर्वेद और होम्योपैथी कॉलेजों में 85% से अधिक की हिस्सेदारी निजी क्षेत्र की है।
- 2021 से 2024 के बीच प्रवेश क्षमता में 25% की वृद्धि हुई है, लेकिन गुणवत्ता मानकों में गिरावट देखी गई है।
- NCISM ने कई निजी कॉलेजों को मानकों का पालन न करने के कारण अनुमति देने से मना कर दिया है।
भारत में पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों, विशेष रूप से आयुष (AYUSH) शिक्षा के क्षेत्र में एक खतरनाक प्रवृत्ति देखी जा रही है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 2024 तक आयुर्वेद कॉलेजों का 86% और होम्योपैथी कॉलेजों का 85% हिस्सा गैर-सरकारी या निजी संस्थानों के पास है। यह दर्शाता है कि आयुष बुनियादी ढांचे का विस्तार मुख्य रूप से निजी लाभ से प्रेरित है।
केंद्र सरकार द्वारा 'AYURGYAN' आवंटन में लगभग छह गुना वृद्धि के बाद, 2021 और 2024 के बीच स्वीकृत सीटों में 43% की भारी बढ़ोतरी हुई है। हालांकि, यह विस्तार केवल संख्यात्मक है। जहां एलोपैथिक शिक्षा में मुख्य चिंता छात्रों की तैयारी को लेकर होती है, वहीं आयुष प्रणालियों में बुनियादी सवाल यह है कि छात्रों को वास्तव में क्या सिखाया जा रहा है और क्या प्रशिक्षण की गुणवत्ता मानक स्तर की है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और गुणवत्ता संकट
गुणवत्ता की यह समस्या नई नहीं है। 2005 के एक ऑडिट में, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) ने पाया था कि होम्योपैथी कॉलेजों में अस्पताल के बिस्तरों, ओपीडी सेवाओं और कर्मचारियों की भारी कमी थी। कुछ कॉलेजों में बेड ऑक्यूपेंसी दर मात्र 1% थी। इसी तरह, 2020 के एक शोध पत्र ने खुलासा किया कि कई संस्थानों में आवश्यक शिक्षण कर्मचारियों की 50% से अधिक कमी थी।
Why This Matters
BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि जब चिकित्सा शिक्षा का व्यवसायीकरण होता है, तो रोगी की सुरक्षा खतरे में पड़ जाती है। निजी संस्थानों के लिए अधिक छात्रों को भर्ती करना वित्तीय लाभ का जरिया बन गया है, जबकि प्रयोगशालाओं और अनुभवी प्रोफेसरों की अनदेखी की जा रही है। यह स्थिति भविष्य के डॉक्टरों की दक्षता पर सीधा प्रभाव डालती है।
"चिकित्सा शिक्षा में मात्रा (Quantity) कभी भी गुणवत्ता (Quality) का विकल्प नहीं हो सकती; बिना कड़े नियमों के यह केवल डिग्री बांटने का केंद्र बनकर रह जाएगा।"
राष्ट्रीय भारतीय चिकित्सा प्रणाली आयोग (NCISM) ने हाल ही में 17 निजी आयुर्वेद कॉलेजों की अनुमति रद्द की है। कर्नाटक उच्च न्यायालय ने भी स्वीकार किया है कि कई संस्थान वित्तीय लाभ के लिए क्षमता से अधिक छात्रों का प्रवेश कराते हैं। राष्ट्रीय होम्योपैथी आयोग ने लगभग आधे निजी संस्थानों को सबसे निचला ग्रेड दिया है, जो इस संकट की गहराई को दर्शाता है।
| विवरण | आयुर्वेद कॉलेज (2024) | होम्योपैथी कॉलेज (2024) |
|---|---|---|
| निजी क्षेत्र की हिस्सेदारी | 86% | 85% |
| मुख्य समस्या | संकाय और बुनियादी ढांचा | निम्न ग्रेडिंग और बेड की कमी |
Frequently Asked Questions
प्रश्न 1: NCISM की भूमिका क्या है?
NCISM भारतीय चिकित्सा प्रणालियों के लिए नियामक संस्था है जो कॉलेजों के निरीक्षण और मानकों के निर्धारण का कार्य करती है।
प्रश्न 2: निजी आयुष कॉलेजों में मुख्य समस्या क्या है?
मुख्य समस्या वित्तीय लाभ के लिए अत्यधिक छात्रों का प्रवेश लेना और आवश्यक फैकल्टी एवं लैब सुविधाओं की कमी है।