UPSC मुख्य परीक्षा 2027 की तैयारी कर रहे उम्मीदवारों के लिए GS-2 के अंतर्गत अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद और शहरी शासन की चुनौतियों पर एक विस्तृत विश्लेषण और अभ्यास सत्र।
- कावेरी जल विवाद में 'डिस्ट्रेस शेयरिंग' (संकट साझाकरण) फॉर्मूले का अभाव एक बड़ी चुनौती है।
- शहरी शासन में नियामक प्रावधानों और उनके वास्तविक कार्यान्वयन के बीच एक गहरा अंतर मौजूद है।
- सहकारी संघवाद को मजबूत करने के लिए केवल कानूनी फैसले पर्याप्त नहीं, बल्कि निरंतर संवाद आवश्यक है।
भारत की संघीय संरचना के लिए अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद हमेशा से एक जटिल चुनौती रहे हैं। हालिया विश्लेषणों से पता चलता है कि न्यायिक और संस्थागत तंत्र होने के बावजूद, पानी का समान वितरण सुनिश्चित करना कठिन बना हुआ है। विशेष रूप से कावेरी विवाद यह दर्शाता है कि जब पानी की उपलब्धता सामान्य से कम होती है, तो कानूनी समझौते भी विफल होने लगते हैं।
कावेरी विवाद: संस्थागत विफलताओं का विश्लेषण
कावेरी विवाद के संदर्भ में, सबसे बड़ी समस्या 2018 के सुप्रीम कोर्ट के ढांचे में सूखे के वर्षों के लिए किसी विशिष्ट वितरण सूत्र का न होना है। जब मानसून विफल होता है, तो कर्नाटक जैसे ऊपरी राज्यों में पीने के पानी और कृषि की मांग बढ़ जाती है, जबकि तमिलनाडु जैसे निचले राज्य अपनी डेल्टा खेती के लिए आपूर्ति पर निर्भर रहते हैं।
यद्यपि कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA) और कावेरी जल विनियमन समिति (CWRC) जैसे निकाय बनाए गए हैं, लेकिन उनके निर्देश अक्सर राजनीतिक विरोध और कानूनी अपीलों का सामना करते हैं। पानी केवल एक संसाधन नहीं, बल्कि एक भावनात्मक और चुनावी मुद्दा बन गया है, जिससे संस्थागत निर्णयों का पालन करना और भी कठिन हो जाता है।
Why This Matters
BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि भारत में जल विवाद अब केवल राज्य बनाम राज्य का मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह जलवायु परिवर्तन और तीव्र शहरीकरण (जैसे बेंगलुरु की बढ़ती जरूरतें) से जुड़ा एक अस्तित्वगत संकट बन गया है। यदि 'डिस्ट्रेस शेयरिंग' तंत्र को औपचारिक नहीं किया गया, तो भविष्य में सामाजिक तनाव बढ़ सकते हैं।
"कानूनी निर्णय आवंटन की समस्या को हल कर सकते हैं, लेकिन दीर्घकालिक जल शासन के लिए कमी के समय में आपसी सहयोग की आवश्यकता होती है।"
शहरी शासन और भवन सुरक्षा की चुनौतियाँ
भारत के तेजी से बढ़ते शहरों में भवन सुरक्षा मानदंडों का उल्लंघन एक गंभीर समस्या है। 74वें संवैधानिक संशोधन के बावजूद, नगर निकायों की क्षमता और नियामक प्रावधानों के बीच एक बड़ा अंतर है। तेजी से शहरीकरण के कारण निर्माण कार्यों में गुणवत्ता से समझौता किया जाता है और भ्रष्टाचार के चलते सुरक्षा नियमों की अनदेखी की जाती है।
शहरी स्थानीय निकायों (ULBs) के पास अक्सर पर्याप्त तकनीकी जनशक्ति और निगरानी तंत्र की कमी होती है, जिससे अवैध निर्माण और असुरक्षित ऊँची इमारतों का जाल बिछ जाता है। यह विफलता न केवल प्रशासनिक अक्षमता को दर्शाती है, बल्कि नागरिकों के जीवन के अधिकार के लिए भी खतरा पैदा करती है।
Frequently Asked Questions
प्रश्न 1: कावेरी विवाद में मेकेदातु जलाशय का क्या महत्व है?
उत्तर: मेकेदातु परियोजना कर्नाटक द्वारा पीने के पानी के भंडारण के लिए प्रस्तावित है, लेकिन तमिलनाडु को डर है कि इससे भविष्य में पानी की आपूर्ति कम हो जाएगी।
प्रश्न 2: शहरी भवन सुरक्षा में सुधार के लिए क्या आवश्यक है?
उत्तर: इसके लिए सख्त नियामक प्रवर्तन, नगर निकायों का सशक्तिकरण और डिजिटल निगरानी प्रणालियों का कार्यान्वयन आवश्यक है।