निर्देशक महेश भट्ट ने अपनी क्लासिक फिल्म 'ज़ख्म' के सेंसर बोर्ड के साथ संघर्ष को याद करते हुए एक चौंकाने वाला खुलासा किया है। उन्होंने बताया कि कैसे तत्कालीन सेंसर बोर्ड प्रमुख आशा पारेख ने फिल्म को क्लियर करने के लिए राजनेताओं की मदद लेने का सुझाव दिया था।
मुख्य बातें
- महेश भट्ट ने फिल्म 'ज़ख्म' के सेंसर बोर्ड के साथ तीन महीने लंबे संघर्ष को साझा किया।
- उन्होंने खुलासा किया कि आशा पारेख ने फिल्म को राजनीतिक नेताओं के माध्यम से पास कराने का सुझाव दिया था।
- बट्ट ने कहा कि फिल्म की वास्तविकता और उस समय की राजनीतिक स्थिति ने सेंसरशिप को कठिन बना दिया था।
- 'ज़ख्म' अब एक कल्ट क्लासिक फिल्म मानी जाती है।
मशहूर फिल्म निर्देशक महेश भट्ट ने हाल ही में अपनी विवादित और बेहद निजी फिल्म 'ज़ख्म' (Zakhm) के निर्माण के दौरान आए कड़े संघर्षों पर बात की है। भट्ट ने बताया कि यह फिल्म केवल एक सिनेमाई रचना नहीं थी, बल्कि उनके अपने जीवन का एक कड़वा सच था, जिसे सेंसर बोर्ड के सामने पेश करना किसी युद्ध से कम नहीं था।
भट्ट ने याद किया कि फिल्म को सेंसर बोर्ड (CBFC) से मंजूरी मिलने में लगभग तीन महीने का समय लगा। इस दौरान उन्होंने एक ऐसा अनुभव साझा किया जिसने उन्हें अंदर तक झकझोर दिया। भट्ट के अनुसार, उस समय सेंसर बोर्ड की प्रमुख और उनकी सहकर्मी आशा पारेख ने उन्हें एक ऐसा सुझाव दिया जो पेशेवर नैतिकता के खिलाफ था।
राजनीति और सेंसरशिप का टकराव
महेश भट्ट ने बताया, “आशा पारेख, जो बोर्ड पर थीं और हम में से ही एक थीं, उन्होंने सुझाव दिया कि हमें मुंबई में बाल ठाकरे या केंद्र में एलके आडवाणी से इसे क्लियर करवा लेना चाहिए। मैं दंग रह गया। फिल्मों को एक समिति द्वारा देखा जाना चाहिए और उनके निर्णय के आधार पर प्रमाणित किया जाना चाहिए। लेकिन वह बहुत सावधान रहना चाहती थीं। इससे मैं बहुत परेशान हुआ।”
भट्ट ने आगे कहा कि फिल्म को रिलीज करने के लिए उन्हें अंततः गृह मंत्रालय और केंद्र सरकार के साथ बातचीत करनी पड़ी और फिल्म में कुछ बदलाव भी करने पड़े ताकि वह पर्दे पर आ सके।
Why This Matters
BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि महेश भट्ट का यह बयान भारतीय सिनेमा में कलात्मक स्वतंत्रता और राजनीतिक हस्तक्षेप के बीच के पुराने संघर्ष को फिर से जीवित करता है। यह दर्शाता है कि कैसे संवेदनशील विषयों पर बनी फिल्में आज भी सेंसरशिप की चुनौतियों का सामना करती हैं।
"कला को राजनीति की कसौटी पर नहीं, बल्कि समाज के दर्पण के रूप में देखा जाना चाहिए।"
भले ही 'ज़ख्म' बॉक्स ऑफिस पर उस समय सफल नहीं रही, लेकिन समय के साथ इसने एक 'कल्ट क्लासिक' का दर्जा हासिल कर लिया है। भट्ट का मानना है कि फिल्म के विषय—पहचान का संकट और मानवीय संबंध—आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने तीन दशक पहले थे।
Frequently Asked Questions
1. 'ज़ख्म' फिल्म किस बारे में है?
यह फिल्म पहचान के संकट और सांप्रदायिक संबंधों के जटिल विषयों पर आधारित एक भावनात्मक ड्रामा है।
2. महेश भट्ट ने आशा पारेख पर क्या आरोप लगाया?
भट्ट ने कहा कि पारेख ने फिल्म को सेंसर बोर्ड के बजाय राजनेताओं के माध्यम से पास कराने का सुझाव दिया था।