फरहान अख्तर की क्लासिक फिल्म 'दिल चाहता है' ने सिनेमाई व्याकरण तो बदल दिया, लेकिन महिला पात्रों के आर्थिक स्वावलंबन को पीछे छोड़ दिया। एक विस्तृत विश्लेषण जो बताता है कि कैसे फिल्म की नायिकाएं केवल पुरुषों के इर्द-गिर्द सिमट कर रह गईं।

मुख्य बातें

  • 'दिल चाहता है' ने तकनीकी रूप से सिनेमा को बदला, लेकिन लैंगिक भूमिकाओं में नहीं।
  • फिल्म के पुरुष पात्रों के पास स्पष्ट करियर हैं, जबकि महिला पात्र बिना किसी काम के दिखाए गए हैं।
  • शालिनी और पूजा जैसे पात्रों का अस्तित्व केवल पुरुषों के प्रेम संबंधों तक सीमित है।

फरहान अख्तर की साल 2001 की फिल्म 'दिल चाहता है' को भारतीय सिनेमा के इतिहास में एक मील का पत्थर माना जाता है। इसने बॉलीवुड की पारंपरिक शैली को तोड़कर एक नई दृश्य भाषा और यथार्थवादी संवाद शैली पेश की। हालांकि, जब हम आज के परिप्रेक्ष्य में इस फिल्म को देखते हैं, तो एक बड़ी कमी उभर कर सामने आती है: फिल्म की महिला पात्रों के पास कोई पेशा या करियर नहीं है।

फिल्म में आकाश (आमिर खान), समीर (सैफ अली खान) और सिद्धार्थ (अक्षय खन्ना) के विकास को विस्तार से दिखाया गया है। आकाश अपने पिता के व्यवसाय में शामिल होता है, सिद्धार्थ एक कलाकार के रूप में अपनी पहचान बनाता है, और समीर भी काम में व्यस्त दिखता है। इसके विपरीत, प्रीति जिंटा द्वारा निभाया गया शालिनी का किरदार और सोनाली कुलकर्णी का पूजा का किरदार पूरी तरह से आर्थिक रूप से निर्भर दिखाया गया है।

क्यों यह महत्वपूर्ण है

BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि फिल्म की पटकथा ने अनजाने में यह संदेश दिया कि महिलाओं का जीवन केवल रिश्तों और विवाह के इर्द-गिर्द घूमता है। शालिनी, जो एक शिक्षित महिला प्रतीत होती है, रोहित के परिवार पर भावनात्मक और आर्थिक रूप से निर्भर है। बिना किसी नौकरी या आय के स्रोत के, उसका जीवन केवल पुरुषों के निर्णयों से संचालित होता है।

'दिल चाहता है' ने दोस्ती के नए मानक तो स्थापित किए, लेकिन महिला सशक्तिकरण की कहानी कहने में यह पीछे रह गई।

हालाँकि डिंपल कपाड़िया का किरदार 'तारा' एक कामकाजी महिला के रूप में दिखाई गई है, लेकिन वह फिल्म के मुख्य समूह में एक अपवाद मात्र है। अधिकांश महिला पात्र केवल 'प्लस वन' (साथी) के रूप में मौजूद हैं, जिनका अपना कोई स्वतंत्र अस्तित्व या पेशेवर महत्वाकांक्षा नहीं है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

2000 के दशक की शुरुआत में, बॉलीवुड में महिला पात्रों को अक्सर केवल 'लव इंटरेस्ट' के रूप में दिखाया जाता था। 'दिल चाहता है' ने आधुनिकता का दावा किया, लेकिन सामाजिक-आर्थिक स्वावलंबन के मामले में यह अभी भी पुराने ढर्रे पर ही चल रही थी।

क्या आप जानते हैं?: 'दिल चाहता है' भारत की उन पहली फिल्मों में से एक थी जिसने संवादों को सेट पर लाइव रिकॉर्ड करने का प्रयोग किया था।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न 1: क्या फिल्म में कोई कामकाजी महिला पात्र है?
हाँ, डिंपल कपाड़िया का किरदार 'तारा' एक कामकाजी महिला के रूप में दिखाई गई है।

प्रश्न 2: फिल्म की मुख्य आलोचना क्या है?
मुख्य आलोचना यह है कि फिल्म की महिला पात्रों के पास कोई करियर या वित्तीय स्वतंत्रता नहीं दिखाई गई है।