एक विस्तृत विश्लेषण कि कैसे भारतीय सिनेमा राष्ट्रीय एकता और सीमा पार के प्रेम की कहानियों से हटकर अब खलनायकी को धार्मिक पहचान से जोड़ने लगा है।
- 'दुश्मन' को एक राजनीतिक या राष्ट्रीय इकाई के बजाय धार्मिक पहचान के रूप में दिखाने का चलन बढ़ा है।
- 'कॉप यूनिवर्स' और ऐतिहासिक फिल्मों में संघर्ष पैदा करने के लिए धार्मिक रूढ़ियों का सहारा लिया जा रहा है।
- 'मैं वापस आऊंगा' जैसी संवेदनशील फिल्मों और प्रोपेगेंडा आधारित व्यावसायिक फिल्मों के बीच गहरा अंतर।
दशकों तक, बॉलीवुड भारत के अपने पड़ोसियों के साथ जटिल संबंधों और आंतरिक संघर्षों का दर्पण रहा है। शुरुआती देशभक्ति फिल्मों में अक्सर औपनिवेशिक शक्तियों, भ्रष्ट राजनेताओं या विभाजन के साझा दर्द के खिलाफ सामूहिक संघर्ष दिखाया जाता था। कहानी आमतौर पर राष्ट्रीय एकता के विचार पर आधारित होती थी, जहाँ खलनायक धर्म या जाति की परवाह किए बिना पूरे देश के सामाजिक ताने-बाने के लिए खतरा होता था।
हालांकि, पिछले एक दशक में एक स्पष्ट बदलाव आया है। सरस्वती दातार के विश्लेषण के अनुसार, सिनेमाई मनोरंजन और राजनीतिक प्रोपेगेंडा के बीच की रेखा धुंधली हो गई है। जहाँ पाकिस्तान पारंपरिक रूप से बाहरी दुश्मन रहा है, वहीं आधुनिक सिनेमा अब 'खतरे' को आंतरिक बना रहा है, और अक्सर खलनायकी को विशिष्ट धार्मिक पहचानों से जोड़ रहा है। यह प्रवृत्ति सिनेमाई अनुभव को देशभक्ति की खोज से हटाकर सामाजिक ध्रुवीकरण के उपकरण में बदल रही है।
यह क्यों महत्वपूर्ण है
BozokMedia के विश्लेषण से पता चलता है कि जब मुख्यधारा का सिनेमा—जो करोड़ों दर्शकों तक पहुँचता है—लगातार विशिष्ट धार्मिक प्रतीकों (जैसे दाढ़ी या खान-पान की आदतें) को आतंकवाद या क्रूरता से जोड़ता है, तो यह वास्तविक दुनिया में हानिकारक रूढ़ियों को मजबूत करता है। यह केवल एक रचनात्मक विकल्प नहीं है, बल्कि एक व्यापक सामाजिक बदलाव का प्रतिबिंब है जहाँ 'दूसरे' को उसके कार्यों से नहीं, बल्कि उसकी पहचान से परिभाषित किया जा रहा है।
उदाहरण के लिए, रोहित शेट्टी के कॉप यूनिवर्स को देखें। जहाँ इसकी शुरुआत बाजीराव सिंघम में एक भ्रष्ट राजनेता के खिलाफ लड़ाई से हुई थी, वहीं यह सूर्यवंशी और सिंघम अगेन तक आते-आते अंडरकवर आतंकवादियों और जुबैर हफीज जैसे खलनायकों के इर्द-गिर्द घूमने लगा। सिंघम अगेन में हिंदू पौराणिक कथाओं (रामायण) का इस्लामी रूढ़ियों के साथ मेल यह दर्शाता है कि धार्मिक आस्था को राष्ट्रीय सुरक्षा के विमर्श के साथ जोड़ने का जानबूझकर प्रयास किया गया है।
खतरा इस बात में है कि 'देशभक्ति' की आड़ में धार्मिक रूढ़िवादिता को सामान्य बनाया जा रहा है, जिससे भारतीय समाज के बहुलवादी ढांचे के टूटने का जोखिम है।
यह चलन ऐतिहासिक महाकाव्यों तक फैला हुआ है। पद्मावत, पानीपत और सम्राट पृथ्वीराज जैसी फिल्मों ने अलाउद्दीन खिलजी और मोहम्मद गौरी जैसे ऐतिहासिक पात्रों को क्रूर और एक-आयामी राक्षसों के रूप में चित्रित किया है। यहाँ तक कि छावा और राजा शिवाजी जैसी हालिया रिलीज में भी संघर्ष को राजनीतिक विजय के बजाय धार्मिक टकराव के रूप में पेश किया गया है।
| युग | 'दुश्मन' का स्वरूप | मुख्य कथा विषय |
|---|---|---|
| क्लासिक बॉलीवुड | उपनिवेशवादी, भ्रष्ट राजनेता, बाहरी राज्य | राष्ट्रीय एकता और सामाजिक सुधार |
| आधुनिक बॉलीवुड | धार्मिक पहचान, आंतरिक 'अन्य' | पहचान-आधारित संघर्ष और ध्रुवीकरण |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: क्या बॉलीवुड की सभी देशभक्ति फिल्में अब प्रोपेगेंडा हैं?
नहीं। 'मैं वापस आऊंगा' जैसी फिल्में साबित करती हैं कि धार्मिक रूढ़ियों का सहारा लिए बिना भी राष्ट्रीय पीड़ा और सीमाओं की कहानियाँ सुनाई जा सकती हैं।
प्रश्न 2: 'कॉप यूनिवर्स' इस बदलाव में कैसे योगदान दे रहा है?
सामान्य अपराधियों को धार्मिक पहचान वाले आतंकवादियों से बदलकर, ये फिल्में सुरक्षा खतरों को अपराध के बजाय पहचान से जोड़कर पेश करती हैं।